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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् । छाया - अधिकरणकरस्य भिक्षोः वदतः प्रसह्यदारुणाम् । अर्थः परिहीयते बहु अधिकरणं न कुर्यात्पण्डितः ॥ अनुवाद - जो साधु अधिकरण-कलह करता है तथा प्रकट रूप में दारुण-कठोर वचन बोलता है उसका अर्थ-जीवन का लक्ष्य मोक्ष तथा उसे प्राप्त करने का मार्ग संयम परिहीन हो जाता है-नष्ट हो जाता है । इसलिये पंडित-ज्ञानी या विवेकशील साधक कलह कदापि न करे । टीका - परिहार्यदोषप्रदर्शनेन अधुनोपदेशाभिधित्सयाऽऽह - अधिकरणं कलहस्तत्करोति तच्छीलश्चैत्यधिकरणकरः तस्यैवम्भूतस्य भिक्षो स्तथाधिकरण करी दारुणां वा भयानकां वा 'प्रसह्य' प्रकटमेव वाचं ब्रुवत: सतः 'अर्थो' मोक्षः तत्कारणभूतो वा संयमः स बहु 'परिहीयते' ध्वंसमुपयाति, इदमुक्तं भवति बहुना कालेन यदर्जितम् विप्रकृष्टेन तपसा महत्पुण्यं तत्कलहं कुर्वतः परोपघातिनी च वाचं ब्रुवतः तत्क्षणमेव ध्वंसमुपयाति, तथाहि _ 'जं अज्जियं समीखल्लएहिं तवनियमबंभमइएहिं । मा हु तयं कलहंता छड्डे अह सागपत्तेहिं' ॥१॥ इत्येवं मत्वा मनागप्यधिकरणं न कुर्यात 'पंडितः' सदसद्विवेकीति ॥१९॥ टीकार्थ – जो दोष त्यागने योग्य है, उनका दिग्दर्शन कराकर सूत्रकार उपदेश देते हैं - अधिकरण का अर्थ कलह है, वैसा करने का जिसका स्वभाव होता है उसे अधिकरणकर कहा जाता है । जो साधु कलहशील है, जिससे कलह उत्पन्न होता है, वह प्रकट रूप में ऐसी दारूण-कठोर या भयंकर वाणी ही बोलता है, वैसा करने वाले का मोक्ष या मोक्षका हेतु संयम ध्वस्त हो जाता है-मिट जाता है । यहां कहने का अभिप्राय यह है कि जो कलह करता है, ऐसी वाणी बोलता है जिससे दूसरे का चित्त दुःखित होता है, उसका बहुत समय में कठिन तपश्चरण द्वारा अर्जित पुण्य तत्काल नष्ट हो जाता है क्योंकि तप, नियम और ब्रह्मचर्य द्वारा जो पुण्यार्जन किया है, उसे कलह द्वारा नष्ट मत करो-ज्ञानीजन ऐसी शिक्षा देते हैं । अतएव सत् और असत का जो विवेक रखता है, वह ज्ञानी पुरुष मनाक-जरा भी कलह न करे । सीओदगपडिदुगुंछिणो, अपडिण्णस्स लवावसप्पिणो । सामाइयमाहु तस्स जं, जो गिहिमत्तेऽसणं न भुंजती ॥२०॥ छाया - शीतोदक प्रतिजुगुप्सकस्य, अप्रतिज्ञस्य लवावसर्पिणः । ___सामायिकमाहु स्तस्य यत् यो गृह्यमत्रेऽशनं न भुंक्ते ॥ अनुवाद - जो श्रमण शीतोदक-शीतल, सचित जल से घृणा करता है तथा जो मन में किसी प्रकार की प्रतिज्ञा-निदान या कामना नहीं रखता, जिनसे कर्मों का बंध होता है, ऐसी प्रवृत्ति से दूर रहताहै, सर्वज्ञों ने उस श्रमण को सामायिकस्थ-समभाव के रूप में आख्यात किया है, जो गृहस्थों के पात्र में भोजन नहीं करता उसको भी समभावक कहा गया है । टीका - तथा शीतोदकम् अप्रासुकोदकं तत्प्रतिजुगुप्सकस्याप्रासुकोदक परिहारिणः साधोः न विद्यते प्रतिज्ञा निदानरूपा यस्य सोऽप्रतिज्ञोऽनिदान इत्यर्थः, लवं कर्म तस्मात् अवसप्पिणोत्ति अवसर्पिणः यदनुष्ठानं कर्मबन्धोपादोनभूतं तत्परिहारिण इत्यर्थः तस्यैवम्भूतस्य साधोर्यस्माक् यत् 'सामायिकं' समभावलक्षणमाहुः (166)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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