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________________ वैतालिय अध्ययनं करे ? उसका निराकरण करते हुए बताया जाता है कि जब तक देवदत्त या यज्ञदत्त हैं, जगत में इस प्रचलित कथा के अनुरूप जब तक जीवित रहे तब तक ज्ञानाराधना आदि में अपनी आत्मा को संस्थित करते हुए शुभ अध्यवसाय पूर्वक संयम का अनुपालन करे अनुसरण करे । इस प्रकार द्रव्याभूत राग द्वेष विवर्जित, मोक्षगमन योग्य तथा सत् असत् के विवेक से युक्त साधु यावज्जीवन संयम का पालन करे । कहने का आशय यह है कि मरने के बाद भी देवदत्त नाम का व्यक्ति था, ऐसी बात संसार में चलती रहती है । इसलिये यहां कहा गया है कि जब तक मौत का समय न आये तब तक मुनि लज्जा और मद का परित्याग करता हुआ संयम की साधना में संप्रवृत्त रहे । दूरं अणुपस्सिया मुणी, तीतं धम्ममणागयं तहा । पुट्ठे फरुसेहिं माहणे, अवि हण्णू समयंमि रीयइ ॥५॥ धर्मयनागतं दूरमनुद्दश्य मुनिरती तं स्पृष्टः परुषै महिनः अपि हन्यमानः समये अनुवाद अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का वेत्ता तथा दूरद्रष्टा- मोक्ष को समझने वाला मुनि परुषकठोर वाक्यों द्वारा स्पृष्ट, प्रताडित तथा दण्ड आदि के द्वारा आहत - मारा पीटा जाता हुआ भी संयम पथ पर गतिशील रहें । छाया - - - तथा । रीयते ॥ टीका . किमालम्ब्यैतद्विधेयमिति, उच्यते दूरवर्त्तित्वात दूरो- मोक्षस्त मनु-पश्चात् तं दृष्ट्वा यदि वा दूरमिति दीर्घकालम् 'अनुदृश्य' पर्यालोच्य 'मुनिः' कालत्रयवेत्ता दूरमेव दर्शयति- अतीतं 'धर्मं' स्वभावं - जीवानामुच्चावचस्थानगतिलक्षणं तथा अनागतं च धर्मं- स्वभावं पर्यालोच्य लज्जामदौ न विधेयौ, तथा ‘स्पृष्ट:' छुप्तः‘परुषै:’दण्डकशादिभिर्वाग्भिर्वा 'माहणे' त्ति मुनि: 'अविहण्णू ' त्ति अपि मार्यमाणः स्कन्दशिष्यगणवत् 'समये' संयमे 'रियते' तदुक्तमार्गेण गच्छतीत्यर्थः, पाठान्तर वा 'समयाऽहियासए' त्ति समतया सहत इति ॥५॥ टीकार्थ किस पदार्थ का अवलम्बन लेकर साधु ऐसा करे, आगमकार इस पर प्रकाश डालते हुए बतलाते हैं दूरवर्ती होने के कारण मोक्ष को दूर शब्द द्वारा अभिहित किया गया है अथवा दीर्घ काल या लम्बे समय को दूर कहा जाता है । अतएव तीनों कालों के वेत्ता - वर्तमान, भूत और भविष्य के द्रष्टा मुनि को दूर अर्थात् मोक्ष को देखकर तथा दूरवर्ती समय का चिन्तन कर लज्जा एवं अभिमान नहीं करना चाहिये । दूरवर्ती काल को सोचने का क्या अभिप्राय है यह प्रश्न उपस्थित कर आगमकार बतलाते हैं अतीत या बीता हुआ समय जो प्राणियों के स्वभाव या धर्म से जुड़ा रहा उसके परिणाम स्वरूप वे ऊँची नीची गतियों में जाते हैं । यह मुनि को देखते रहना है । साथ ही साथ भविष्य पर भी उसे दृष्टि रखनी है । दोनों का स्वरूप समझते रहना है । ऐसा करता हुआ मुनि लज्जा या अभिमान न करे । दण्ड- लट्ठी, कशाचाबुक आदि द्वारा मारा; पीटा जाता हुआ कठोर वाणी द्वारा घर्षित किया जाता हुआ भी वह स्कन्धक मुनि के शिष्य की ज्यों आगमों में निरूपित संयम पथ का अनुसरण करता जाये। यहां 'समयाहियासए' यह पाठान्तर 153
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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