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________________ श्री सूत्रकृताङ्ग सूत्रम् - यहां 'तु' शब्द का प्रयोग अवधारणा के अर्थ में है । अतः इसका अभिप्राय यह है कि पहले कर्मबंध के जो तीन हेतु बताये गये, वे ही व्यस्तरूप में-अलग अलग और समस्त रूप में एक साथ मिलकर कर्म बंध के कारण है । इनमें दुष्ट-दोषयुक्त, दुराशयपूर्ण अध्यवसाय-प्रयत्न, उपक्रम जुड़ा रहता है, तब इन कारणों द्वारा पाप कर्म का बंध होता है । जहां प्राणी की हिंसा के प्रति कृत, कारित और अनुमोदित-ये तीनों स्थितियां नहीं रहती, राग द्वेषादि से प्रेरित प्रवृत्ति नहीं होती, वहां केवल मन से या देह से अथवा आन्तरिक दुःसंकल्प रहित मन और देह से हिंसा हो जाने पर भी भावों के विशुद्ध होने के कारण कर्म जीव सब प्राकर के द्वन्द्वों से-बाधाओं और झंझटों से उपरत-रहित होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। पुत्तं पिया समारब्भ, आहा रेज्ज असंजए । भुंजमाणो य मेहावी, कम्मुणा नोव लिप्पइ ॥२८॥ छाया - पुत्रं पिता समारभ्याहारयेदसंयतः । भुञ्जानश्च मेधावी कर्मणा नोपलिप्यते ॥ अनुवाद - किसी घोर विपत्ती के समय गृहस्थ पिता यदि अपना जीवन बचाने हेतु पुत्र का वध कर उसका मांस भक्षण कर ले तो भी वह-वैसा करता हुआ भी कर्मबद्ध नहीं होता, इसी प्रकार कोई मेधावीराग द्वेष रहित साधु भी मांस भक्षण कर ले तो वह कर्मबद्ध नहीं होगा। टीका - भाव शुद्धया प्रवर्तमानस्य कर्मबन्धो न भवतीत्यत्राऽर्थे दृष्टान्तमाह - पुत्रमपत्यं पिता जनकः समारम्भ व्यापाद्य आहारार्थं कस्याञ्चित्तथाविधायामापदि तदुद्धरणार्थपरक्तद्विष्टोऽसंयतो गृहस्थस्तत्पिशितं भुजानोऽपि, च शब्दस्याऽपि शब्दार्थत्वादिति तथा मेघाव्यपि संयतोऽपीत्यर्थः तदेवं गृहस्थो भिक्षु र्वा शुद्धाशयः पिशिताश्यपि कर्मणा पापेन नोपलिप्यते नाश्लिष्यत इति । यथाचाऽत्र पितुः पुत्रं व्यापादयतस्तत्रारक्तद्विष्टमनसः कर्मबन्धो न भवति तथाऽन्यस्याऽप्यरक्तद्विष्टान्तःकरणस्य प्राणिवधे सत्यपि न कर्मबन्धो भवतीति ॥२८॥ टीकार्थ - भावों की शुद्धि के साथ प्रवृत्त होता है, प्रवृत्ति या क्रिया करता है, उस व्यक्ति के कर्मों का बंध नहीं होता, इस सम्बन्ध में आगमकार अन्य दार्शनिकों का मन्तव्य प्रकट करते हैं जैसे कोई गृहस्थ पिता किसी भयावह विपत्ति के समय उससे बचने के लिये अपने पुत्र का हनन कर उसका मांस भक्षण कर ले तो वह राग द्वेष रहित होने के कारण कर्म बद्ध नहीं होता-उससे पाप कर्म नहीं लगते । उसी प्रकार राग द्वेष रहित साधु भी मांस खाता हुआ कर्मोपलिप्त नहीं होता। यहां 'च' शब्द का प्रयोग अपि के अर्थ में है । इसका सार यह है कि चाहे गृहस्थ हो या भिक्षु हो, जिसका आशय-भाव या अभिप्राय शुद्ध होता है, वह आमिष भोजन करता हुआ भी कर्मबद्ध नहीं होता-पाप से उपलिप्त नहीं होता। पुनः उसी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं-जैसे रागात्मक और द्वेषात्मक भावना से विवर्जित पिता पुत्र का वध करने पर भी कर्मबन्ध नहीं करता उसी प्रकार जिसका अन्त:करण राग और द्वेष से रहित है, उसके द्वारा प्राणी की हिंसा हो जाय तो कर्मबन्ध नहीं होता ।' मणसा जे पउस्संति, चित्तं तेसिं ण विजइ । अणवज मतहं तेसिं, ण ते संवुडचारिणो ॥२९॥ 86)
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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