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________________ स्वसमय वक्तव्यताधिकारः अनुवाद इस प्रकार ज्ञान रहित ब्राह्मण और श्रमण परम्परा से सम्बद्ध व्यक्ति अपने अपने ज्ञान का प्रतिपादन करते हैं, पर वे सुनिश्चित अर्थ को नहीं जानते । वे उसी तरह बोध रहित - ज्ञान रहित हैं । जिस प्रकार आर्य भाषा के ज्ञान से रहित एक म्लेच्छ आर्य भाषा को केवल अनुवाद मात्र कर पाता है, उसका तात्पर्य नहीं जानता । टीका एवं दृष्टान्तं प्रदर्श्य दृष्टान्तिकं योजयितुमाह । यथा म्लेच्छोऽम्लेच्छस्य परमार्थमजानानः केवलं तद्भाषितमनुभाषते तथा अज्ञानिकाः सम्यग्ज्ञानरहिताः श्रमणाः ब्रह्मणा वदन्तोऽपि स्वीयं स्वीयं ज्ञानं प्रमाणत्वेन परस्परविरुद्धार्थ भाषणात् निश्चयार्थं न जानन्ति, तथाहि ते स्वकीयं तीर्थंकरं सर्वज्ञत्वेन निर्द्धार्य्य तदुपदेशेन क्रियासु प्रवर्तेरन्, न च सर्वज्ञविवक्षा, अर्वाग्दर्शिना ग्रहीतुं शक्यते 'नासर्वज्ञ सर्वज्ञं जानाती' तिन्यायात् । तथा चोक्तम् ‘सर्वज्ञोऽसावितिह्येतत्तत्कालेऽपि बुभुत्सुभिः । तद्ज्ञानज्ञेयविज्ञानरहितै र्गम्यते कथम् ॥१॥ एवं परचेतोवृत्तीनां दुरन्वयत्वादुपदेष्टुरपि यथावस्थितविवक्षया ग्रहणासम्भवान्निश्चयार्थमजानाना: म्लेच्छवदपरोक्तमनुभाषन्त एव अबोधिका बोध रहिताः केवलमिति, अतोऽज्ञानमेव श्रेय इति । एवं यावद्यावज्ज्ञानाभ्युपगम स्तावत्तावद्गुरुतरदोष-सम्भवः । तथाहि योऽवगच्छन् पादेन कस्यचित् शिरः स्पृशति तस्य महानपराधो भवति यस्त्वभोगेन स्पृशति तस्मैन कश्चिदपराध्यतीति एवञ्चाज्ञानमेव प्रधानभावमनुभवति, न तु ज्ञानमिति ॥१६॥ टीकार्थ – अज्ञानवादियों द्वारा अपने पक्ष के समर्थन हेतु दिये जाने वाले दृष्टान्त को प्रस्तुत कर अब दृष्टान्त द्वारा विवेच्यमान तथ्य के साथ आगमकार योजना करते हैं। 44 जैसे एक म्लेच्छ पुरुष अम्लेच्छ पुरुष - आर्यजन द्वारा प्रकटित भाषा या वाणी का सही सही अर्थ नहीं जानता, वह केवल उसकी अनुवृत्ति या पुनरावृत्तिमात्र करता है, जिनका अभिप्राय जानने की दृष्टि से कुछ भी फलित नहीं होता । वही बात सम्यक् ज्ञान विवर्जित श्रमणो- श्रमण परम्परा के अन्तरवर्ती जैनेत्तरवादियों तथा ब्राह्मणों-ब्राह्मण परम्परा के अन्तरवर्ती तापस-परिव्राजक आदि वादियों पर लागू होती है । यद्यपि वे सब अपने अपने द्वारा प्रतिपादित ज्ञान को प्रामाणिक बतलाते हैं वे जो अभिप्राय या आशय प्रकट करते हैं वह उनमें परस्पर मेल नहीं खाता । एक दूसरे के विपरीत होता है, वे अपने अपने तीर्थंकरों को सिद्धान्त प्रवर्तकों को सर्वज्ञ मानते हैं । उनके उपदेश के अनुरूप क्रिया में प्रवृत्त होते हैं किन्तु सर्वज्ञ की विवक्षा- वक्तुंइच्छा - अभिप्राय को अर्वाकदर्शी - मात्र सम्मुखीन या अपने सामने की वस्तु को देखने वाले बहुत साधारण योग्यता वाले पुरुष नहीं जान पाते । कारण यह है कि सर्वज्ञ को वही जान सकता है जो सर्वज्ञ है । असर्वज्ञ सर्वज्ञ को जान पाने में कभी सक्षम नहीं होता । कहा गया है, जिस पुरुष को सर्वज्ञ के ज्ञान के संबंध में और ज्ञेय - जानने योग्य अर्थ समुदाय के संबंध में ज्ञान नहीं है, यदि उसके समीप सर्वज्ञ उपस्थित भी हो तो वह उन्हें कैसे जान सकता है अर्थात् नहीं जान सकता । चित्त की वृत्तियां दुरन्वय- बड़ी कठिनाई से जानने योग्य होती है । उपदेष्टाउपदेश देने वाले पुरुष की यथावस्थित विवक्षा जो पदार्थ जैसे हैं, उनको ठीक उसी रूप में विवक्षित करने की - प्रतिपादित करने की क्षमता को भी जान पाना संभव नहीं होता । इसलिये निश्चित अर्थ को जानने में असमर्थ - उसे यथावत रूप में नहीं जान सकने वाले अज्ञानवादी पहले वर्णित म्लेच्छ की ज्यों केवल अन्य पुरुष की उक्ति का अनुवाद - अनुसरण या अनुवचन मात्र ही कर सकते हैं क्योंकि यथार्थतः वे बोध शून्य है, ज्ञान रहित है । इसीलिये अज्ञान ही श्रेष्ठ है, ऐसा उनका मन्तव्य है । वे ऐसा प्रतिपादित करते हैं कि ज्यों ज्यों I I 73
SR No.032440
Book TitleSutrakritang Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Acharya, Priyadarshan Muni, Chhaganlal Shastri
PublisherShwetambar Sthanakvasi Jain Swadhyayi Sangh
Publication Year1999
Total Pages658
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size21 MB
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