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________________ ४५८ ] [ कर्मप्रकृति १. उदयप्रकरण गाथा ३२ के सन्दर्भ में कर्मग्रन्थकार एकेन्द्रिय जीवों में किसी प्रकार का संहनन नहीं मानते हैं किन्तु सिद्धान्तकार एकेन्द्रिय में सेवार्त संहनन स्वीकार करते हैं। जैसा कि शास्त्र (जीवाभिगमसूत्र) में पृथ्वीकाय संबंधी प्रकरण में प्रश्न किया गया है - ‘से किं तं संघयणा पण्णता - गोयमा छेवट्ट संघयणा पण्णत्ता।' यह शास्त्रकार का अभिप्राय युक्तिसंगत प्रतीत होता है क्योंकि सभी तिर्यंच और मनुष्यों में औदारिकादि तीन शरीर अनिवार्यरूप से पाये जाते हैं। औदारिक शरीर की जिन औदारिक पुद्गल वर्गणाओं से संरचना होती है वह संरचना सेहनन के बिना शक्य नहीं हो सकती है। जिस प्रकार पुद्गलों के महास्कंध में जितनी शक्ति होती है उतनी शक्ति एक परमाणु में नहीं हो सकती तथापि उसमें शक्ति का बिल्कुल अभाव नहीं बताया जा सकता। ठीक इसी प्रकार महाशक्ति सम्पन्न औदारिक शरीर में जहां वज्रऋषभ-नाराच संहनन की स्थिति बनती है। उससे कम कम शक्ति सम्पन्न शरीर में क्रमशः अर्द्धऋषभ नाराच, ऋषभ नाराच आदि संहननों की स्थिति बनती है किन्तु जिस जीव का औदारिक शरीर बहुत अल्प है उसकी अल्पतम शक्ति का सामान्य बुद्धि वाले साधकों को बोध नहीं हो सके किन्तु केवली की दृष्टि में अल्पतम तत्व का भी स्पष्ट ज्ञान होता है । उस अल्पतम शक्ति की अपेक्षा उसमें (एकेन्द्रिय में) सेवार्तिसंहनन प्रतिपादित किया है। २. सत्ताप्रकरण गाथा ४ से संबंधित सत्ताप्रकरण गाथा ४ में गुणस्थानों में मिथ्यात्व की सत्ता कहां कहां विद्यमान है इस विषय का प्रतिपादन किया गया है। तदन्तर्गत आदि के तीन गुणस्थानों में मिथ्यात्व की अनिवार्यरूप से विद्यमानता प्रतिपादित की है किन्तु चतुर्थ गुणस्थान से ले कर ग्यारहवें गुणस्थानपर्यन्त मिथ्यात्व की सत्ता की भजना कही गई है। इसका तात्पर्य यह है कि इन गुणस्थानों में मिथ्यात्व की सत्ता हो भी सकती है और नहीं भी। उपर्युक्त आठ गुणस्थानों में जहां मिथ्यात्व संबंधी प्रकृतियों का क्षय हो चुका है, वहां मिथ्यात्व की सत्ता नहीं रहती, किन्तु जहां मिथ्यात्व संबंधी प्रकृतियों का क्षयोपशम या उपशम है, वहां मिथ्यात्व संबंधी प्रकृतियां विद्यमान रहेंगी। - इसका आशय यह है कि अविरति सम्यक्दृष्टि के चतुर्थ गुणस्थान में मिथ्यात्व का क्षय नहीं हुआ, सत्ता में विद्यमान है। किन्तु उपशम या क्षयोपशम की अवस्था में औपशमिक या क्षायोपशमिक सम्यक्त्व तो अवश्य मानी गई है। मिथ्यात्व की सत्ता मात्र से क्षयिक सम्यक्त्व के अतिरिक्त अन्य सम्यक्त्व का अभाव नहीं माना गया है। वैसे ही दूसरे सास्वादन गुणस्थान में मिथ्यात्व की सत्ता तो रही हुई है, उदय में नहीं है। फिर भी अनन्तानुबंधीचतुष्क का उदय हो चुका है ऐसी अवस्था में चतुर्थ
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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