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________________ ५. ४५४ ] [ कर्मप्रकृति ५. आठ भंगों के नाम और उनका स्पष्टीकरण (उपशमनाकरण गा. २८, २९ से संबंधित) १. जानते नहीं है, ग्रहण नहीं करते हैं, पालन नहीं करते हैं। सर्वलोक २. जानते नहीं हैं, ग्रहण नहीं करते हैं, पालन करते हैं। अज्ञानी बाल तपस्वी ३. जानते नहीं हैं, ग्रहण करते हैं, पालन नहीं करते हैं। अगीतार्थ ४. जानते नहीं हैं, ग्रहण करते हैं, पालन करते हैं। अगीतार्थ ५. जानते हैं, ग्रहण नहीं करते हैं, पालन नहीं करते हैं। श्रेणिक आदि ६. जानते नहीं हैं, ग्रहण नहीं करते हैं, पालन करते हैं। अनुत्तर विमानवासीदेव ७. जानते हैं, ग्रहण करते हैं, पालन नहीं करते हैं। संविग्न पाक्षिक ८. जानते हैं , ग्रहण करते हैं, पालन करते हैं। महाव्रतधारी उक्त आठ भंगों में से आदि के चार भंगों को सम्यक् ज्ञान से शून्य माना है। लेकिन यह बात भंगों की शैली से उपयुक्त प्रतीत नहीं होती है। ___ आदि के दो भंग तो सम्यक् ज्ञान से शून्य कहे जा सकते हैं परन्तु तीसरा भंग ऐसा नहीं है। क्योंकि तीसरे भंग में विशेष प्रकार से जानता नहीं है, लेकिन उसका आदर करता है। आदर करके भी पालन नहीं कर सकता है, इस दृष्टि से भले ही उसको पूर्व के दो भंगों की श्रेणी में डाल दें, परन्तु इसमें अंतरंग दृष्टि से वह जीव आंशिक रूप से सम्यक्त्व की दिशा के अभिमुख हो सकता है । चौथा भंग जिसमें यह कहा गया है कि वह जानता नहीं है किन्तु आदर करता है और पालता है। यहां नहीं जानने का तात्पर्य सर्वथा नहीं जानता है, ऐसा नहीं समझना चाहिये, क्योंकि आदर करता है, पालता है, उससे यह कहा जा सकता है कि उसे सामान्य जानकारी तो है ही लेकिन विशेष ज्ञान या जानकारी नहीं होने से नहीं जानता है ऐसा कथन किया गया है। ऐसा व्यक्ति जो विशिष्ट श्रुत से केवल अनिभिज्ञ रहता हुआ अगीतार्थ सम्यग्दृष्टि की श्रेणी में ग्रहण किया जा सकता है पांचवां भंग जो जानता है, पर पालन करने की दृष्टि से आदर नहीं करता है, परन्तु श्रद्धा रूप से आदर कर पालन करने की भावना उसमें रहती है । ऐसे व्यक्ति श्रेणिक आदि कहे जा सकते हैं। छठा भंग जानते हैं लेकिन व्रत प्रत्याख्यान को स्वीकार नहीं करने से आदर नहीं करते हुये भी पालन करते हैं, ऐसे अनुत्तर विमानवासी देव। सातवें भंग का स्वामी जानता है व्रत प्रत्याख्यान करने रूप आदर करता है लेकिन पालन नहीं कर पाता है ऐसा संविग्न पाक्षिक पार्श्वस्थ साधु। आठवें भंग का स्वामी जानता है, उसके अनुरूप आदर करता है, और पालता भी है। ऐसा देशव्रती श्रावक एवं सर्वरति व्रतधारी साधु दोनों ही अपने अपने स्थान पर ग्रहण किये जा सकते हैं।
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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