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________________ सत्ताप्रकरण ] [ ३९३ ___ गाथार्थ – संज्वलनत्रिक में इसी प्रकार जानना चाहिये और समस्त योगस्थानों को दो समय कम आवलिका के समयों के साथ गुणा करने पर जितने होते हैं, उतने अधिक जानना। विशेषार्थ – 'संजलणतिगे' अर्थात् संज्वलनत्रिक संज्वलन क्रोध, मान, माया में भी पूर्वोक्त प्रकार से स्पर्धकों का कथन करना चाहिये। जिसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है - क्रोधादि संज्वलन कषायों की प्रथमस्थिति जब तक एक आवलिका प्रमाण शेष रहती है, तब तक स्थितिघात, रसघात, बंध, उदय और उदीरणा होती रहती है और प्रथमस्थिति के आवलिका प्रमाण शेष रह जाने पर स्थितिघात आदि विच्छिन्न हो जाते हैं। तब अनन्तर समय में एक समय कम आवलिकागत और दो समय कम दो आवलिकाबद्ध दलिक विद्यमान रहते हैं और अन्य सब क्षीण हो जाते हैं, तब एक समय कम आवलिकागत दलिक के स्पर्धकों का कथन जैसे पहले किया गया है, उसी प्रकार यहां भी समझ लेना चाहिये और जो दो समय कम दो आवलिकाबद्ध दलिक पूर्व में कहे गये समयोन आवलिका प्रमाण (अन्त्य प्रदेशोदयावलिका सम्बंधी) स्पर्धकों में यह अन्त्य स्थितिघात सम्बंधी स्पर्धक को मिलाने पर सम्पूर्ण आवलि प्रमाण स्पर्धक होते हैं। इसका आशय यह है कि एक आवलिका शेष रहने रह जाने पर स्थितिघातादि विच्छेद को प्राप्त होने से यहां स्थितिघात सम्बंधी स्पर्धक नहीं बनते हैं। किन्तु शेष रही हुई प्रदेशावलि और समयोन दो आवलिका का बंधा हुआ दलिक जो सत्ता में रहा हुआ है, वह उसका स्पर्धक बनेगा। उनका कथन दूसरे प्रकार से किया जाता है। क्योंकि पूर्व प्रकार से यहां पर (द्विसमयोन आवलिकाबद्ध दलिक में) स्पर्धक का स्वरूप नहीं पाया जाता है। प्रश्न – स्थितिघात, रसघात, बंध उदय और उदीरणा के विच्छेद के अनंतर समय में दो समय कम दो आवलिकाबद्ध ही दलिक हैं और शेष नहीं हैं यह कैसे जाना जाता है ? उत्तर - चरम समय में क्रोधादि को वेदन करने वाले जीव के द्वारा जो बद्ध दलिक है वह बंधावालिका के व्यतीत होने पर आवलिका मात्र काल में सम्पूर्ण रूप से संक्रान्त हो जाता है और ऐसा होने पर आवलिका के चरम समय में वह स्वरूप की अपेक्षा अकर्मी अर्थात् कर्म रहित १. इसका आशय यह है कि एक आवलिका शेष रहने पर स्थितिघातादि विच्छेद को प्राप्त होने से यहां स्थितिघात संबंधी स्पर्धक नहीं बनते हैं। किन्तु शेष रही हुई प्रदेशावलि और समयोन दो आवलिका का बंधा हुआ दलिक जो सत्ता में रहा हुआ है, वह उसका स्पर्धक बनेगा। २. आशय यह है कि पूर्व में जैसे एक-एक प्रदेश की वृद्धि द्वारा स्पर्धक बना, वैसा यहां एक एक प्रदेश की वृद्धि से स्पर्धक नहीं बनता है किन्तु योगस्थान की निरन्तर वृद्धि और प्रदेशों की सान्तर वृद्धि से ही बद्ध सत् दलिकों का स्पर्धक बनता है।।
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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