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________________ ३३४ ] [ कर्मप्रकृति पुद्गल निर्जीण होते हैं और अल्प ही शेष रहते हैं। इसलिये उससे उत्कृष्ट प्रदेशोदय प्राप्त नहीं होता है । इसलिये गाथा में 'लहुखवणाए''लघुक्षपणा' से अभ्युत्थित जीव के यह पद दिया है उस गुणितकाँश और गुणश्रेणी के शीर्ष पर वर्तमान जीव के क्षीणमोह गुणस्थान के चरम समय में उत्कृष्ट प्रदेशोदय होता है। अवधिद्विकावरणों के उत्कृष्ट प्रदेशोदय के स्वामित्व के लिये यह विशेष है कि 'ओहीणणोहिलद्धिस्स त्ति'। अर्थात् अवधिज्ञानावरण और अवधिदर्शनावरण का उत्कृष्ट प्रदेशोदय अनवधिलब्धिक अर्थात् अवधिलब्धि से रहित और कर्मक्षपणा के लिये उद्यत जीव को जानना चाहिये। क्योंकि अवधिज्ञान को उत्पन्न करते हुये बहुत से पुद्गल क्षय होते हैं । इसलिये अवधिलब्धि से युक्त जीव के उत्कृष्ट प्रदेशोदय नहीं होता है। इसलिये 'अनवधिलब्धि युक्तजीव' यह विशेषण दिया गया है। . मोहनीयकर्म की सम्यक्त्वमोह, संज्वलनचतुष्क वेदत्रिक इन आठ प्रकृतियों का उत्कृष्ट प्रदेशोदय गुणितकांश क्षपक के अपने अपने उदय के चरम समय में प्राप्त होता है। 'जिणोदइयाण' अर्थात् जिनोदयिक यानि जिन 'केवली' अवस्था में जिन प्रकृतियों का उदय पाया जाता है, ऐसी औदारिकसप्तक, तैजससप्तक, संस्थानषट्क, प्रथमसंहनन, वर्णादिबीस, पराघात, उपघात, अगुरुलघु, विहायोगतिद्विक, प्रत्येक, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ और निर्माण रूप बावन प्रकृतियों का उत्कृष्ट प्रदेशोदय गुणितकांश जीव के सयोगिकेवली गुणस्थान के चरम समय में होता है तथा सुस्चर और दुस्वर का स्वर के निरोधकाल में, उच्छ्वास नाम का उच्छ्वास के निरोध काल में उत्कृष्ट प्रदेशोदय प्राप्त होता है तथा अन्यतर वेदनीय, मनुष्यगति, मनुष्यायु, पंचेन्द्रिय जाति, त्रस बादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय यश:कीर्ति, तीर्थंकर और उच्चगोत्र इन बारह प्रकृतियों का उत्कृष्ट प्रदेशोदय गुणितकांश अयोगि केवली के चरम समय में होता है, तथा - उवसंतपढमगुण - सेढीए निहादुगस्स तस्सेव। पावइ सीसगमुदयंति जाय देवस्स सुरनवगे॥ १२॥ शब्दार्थ – उवसंत - उपशांत मोही के, पढमगुणसेढीए - प्रथम गुणश्रेणी पर, निद्दादुग्गस्स - निद्राद्विक का, तस्सेव - उसी के, पावइ - प्राप्त होता है, सीसगं - शीर्ष को, उदय - उदय, अंतिअनन्तर, जायदेवस्स - देव हुए, सुरनवगे - सुरनवक का। गाथार्थ – अपनी गुणश्रेणी के शीर्ष पर वर्तमान उपशांत मोही के निद्राद्विक का और मर कर देव भव में उत्पन्न एवं उस समय स्वगुणश्रेणी शीर्ष पर विद्यमान उसी जीव के सुरनवक का उत्कृष्ट प्रदेशोदय प्राप्त होता है।
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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