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________________ [ ३०७ उपशमनाकरण ] गाथार्थ द्वितीय स्थिति में से दलिक को आकर्षित कर उदयादि समयों में विशेषहीन श्रेणी से प्रक्षेप करता है और आवलिका से ऊपर असंख्यात गुणित प्रक्षेप करता है । - उदय समय विशेषार्थ उपशांतमोह गुणस्थान से गिरता हुआ क्रम से संज्वलन लोभ आदि कर्मों का अनुभव करता है, यथा- सर्व प्रथम संज्वलन लोभ को, तत्पश्चात् जहां माया का उदयविच्छेद हुआ था, वहां से लेकर माया को तत्पश्चात् जहाँ मान के उदय का विच्छेद हुआ था वहाँ से नीचे मान को और जहां पर क्रोध के उदय का विच्छेद हुआ था, वहां से क्रोध को आरम्भ करके उसका अनुभव करता है। इस प्रकार क्रम से उदय को प्राप्त उन कर्मों का अनुभव करने के लिये द्वितीय स्थिति से उनके दलिकों का अपकर्षण करके अर्थात् खींचकर प्रथम स्थिति को करता है और उदय समय को आदि लेकर शेष स्थितियों में श्रेणी के क्रम से विशेषहीन विशेषहीन प्रक्षेपण करता है, यथा में बहुत प्रक्षेप करता है उससे दूसरे समय में विशेषहीन और उससे भी तीसरे समय में विशेषहीन प्रक्षेप करता है । इस प्रकार उदयावलिका के चरम समय तक जानना चाहिये और उसके पश्चात् उदयावलिका से ऊपर असंख्यात गुणित दलिक प्रक्षेप करता है यथा उदयावलि से ऊपर प्रथम समय में उससे पूर्ववर्ती अनन्तर समय वाले दलिक निक्षेप की अपेक्षा असंख्यात गुणित दलिक निक्षेप करता है, उससे भी दूसरे समय में असंख्यात गुणित और उससे भी तीसरे समय में असंख्यात गुणित दलिक निक्षेप करता है । इस प्रकार गुणश्रेणी के शीर्ष तक जानना चाहिये । इसके पश्चात् फिर पूर्वोक्त क्रम से विशेषहीन विशेषहीन दलिक निक्षेप करता है तथा - - - बाहिरओ । वेइज्जंतीणेवं, इयरासिं आलिगाए न हि संकमोणुपुव्विं, छावलिगोदीरणा उप्पिं ॥ ५९ ॥ शब्दार्थ वेइज्जतीवं इस प्रकार वेद्यमान प्रकृतियों का, इयरासिं आलिगाए – आवलिका से, बाहिरओ नहीं ही, संकमोणुपुव्विं - अनुपूर्वी बाहर, नह संक्रमण, छावलिगा छह आवलिका, उदीरणां - उदीरणा, उप्पिं इतर का, - ऊपर । - - - - गाथार्थ इस प्रकार वेद्यमान प्रकृतियों का दलिक निक्षेप जानना चाहिये, किन्तु इतर का आवलिका से बाहर निक्षेप होता है । उनका सिर्फ अनुपूर्वी संक्रम ही नहीं होता है और छह आवलिकाओं से ऊपर उदीरणा नहीं होती है। - विशेषार्थ – पूर्व गाथा में कहा गया यह दलिक निक्षेप उस काल में वेद्यमान प्रकृतियों का ही जानना चाहिये, इतर का नहीं । किन्तु इतर अर्थात् अवेद्यमान प्रकृतियों का दलिक निक्षेप आवलिका से ऊपर ही होता है और वह भी असंख्यात गुणित क्रम से गुणश्रेणीशीर्ष तक होता है। उससे आगे पुन: पहले कहे गये क्रम से विशेषहीन होता है । गाथा में 'हि' शब्द अर्थात् अवधारणार्थक है अर्थात् विशेष
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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