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________________ २९८ ] [ कर्मप्रकृति स्थितिबंध दो मास का होता है और शेष कर्मों का स्थितिबंध संख्यात वर्ष का होता है। उस समय संज्वलन मान का बंध, उदय और उदीरणा विच्छिन्न हो जाती है। अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण मान उपशांत हो जाते हैं और संज्वलन मान की भी प्रथमस्थिति की एक आवलिका और समयोन दो आवलिका बद्धलताओं को छोड़ कर शेष सर्व दलिक उपशांत हो जाते हैं। उसी समय संज्वलन माया की द्वितीय स्थिति के दलिक को आकृष्ट कर प्रथमस्थिति करता है और उसे वेदन करता है तथा पूर्वोक्त संज्वलन मान की प्रथमस्थिति संबंधी एक आवलिका को स्तिबुकसंक्रमण से इस संज्वलन माया में प्रक्षिप्त करता है। समयोन आवलिकाद्विक बद्धलता को पुरुषवेद के क्रम से उपशमित और संक्रमित करता है। संज्वलन माया के उदय होने के प्रथम समय में माया और लोभ का स्थितिबंध दो मास है और ज्ञानावरणादि शेष कर्मों का स्थितिबंध संख्यात वर्ष है। उसी समय से लगाकर तीनों ही माया कषायों की एक साथ उपशमना आरंभ करता है । तब संज्वलन माया की प्रथमस्थिति में तीन आवलिका काल शेष रह जाने पर अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण माया के दलिक को संज्वलन माया में प्रक्षिप्त नहीं करता है किन्तु संज्वलन लोभ में प्रक्षिप्त करता है। दो आवलिका काल शेष रह जाने पर आगाल विच्छिन्न हो जाता है। तत्पश्चात् उदीरणा ही होती है और वह भी आवलिका के चरम समय प्राप्त होने तक होती है। उस समय में संज्वलन माया और लोभ का स्थितिबंध एक मास होता है और शेष कर्मों का संख्यात वर्ष होता है। उसके अनन्तर समय में संज्वलन . माया का बंध, उदय और उदीरणा विच्छिन्न हो जाती है । अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण माया उपशांत हो जाती है। संज्वलन माया की प्रथमस्थिति संबंधी एक आवलिका को और समयोन आवलिकाद्विक बद्धलताओं को छोड़ कर शेष अन्य सर्व उपशांत हो जाता है। उसी समय संज्वलन लोभ की द्वितीयस्थिति से दलिक को आकृष्ट कर प्रथमस्थिति करता है और वेदन करता है तथा पूर्वोक्त माया की प्रथमस्थिति संबंधी एक आवलिका को स्तिबुकसंक्रम से संज्वलन लोभ में संक्रमाता है तथा समयोन आवलिकाद्विक बद्धलताओं को पुरुषवेद के क्रम से उपशमाता है और संक्रमाता है। अब संज्वलन लोभ की प्रथमस्थिति के प्रमाण का निरूपण करते हैं - लोभस्स बेतिभागा, ठि(बि)इय तिभागोत्थ किट्टकरणद्धा। एगफड्डगवग्गण - अणंतभागो उता हेट्ठा॥४९॥ शब्दार्थ – लोभस्स – संज्वलन लोभ के, बेतिभागा - दो त्रिभाग, ठिइय – स्थिति में, बिइय – दूसरा, तिभागो – त्रिभाग, त्थ – यहां उसमें, किट्टकरणद्धा – किट्टीकरणद्धा, एगफडुगवग्गण - एक स्पर्धक की वर्गणाओं की, अणंतभागो - अनंतवां भाग, उ – और,ता – उनमें,
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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