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________________ २०६ ] [ कर्मप्रकृति उत्तर – देवगति में उत्कृष्ट संक्लेश में वर्तमान कोई देव ही एकेन्द्रियों के योग्य आतप, स्थावर और एकेन्द्रिय जाति की उत्कृष्ट स्थिति को बांधता है, अन्य जीव नहीं बांधता है और वह उसे बांधकर वहीं पर ही देवभव में अन्तर्मुहूर्त काल तक रहता है। तत्पश्चात् काल करके बादर पृथ्वीकायिकों के मध्य उत्पन्न होता है और उत्पन्न होता हुआ शरीरपर्याप्ति से पर्याप्त होकर आतप नामकर्म के उदय में वर्तमान रहता हुआ उसकी उदीरणा करता है । इसलिये ऐसा होने पर उसकी अन्तर्मुहूर्त से हीन ही उत्कृष्ट स्थिति उदीरणा के योग्य होती है। ___यहां आतप प्रकृति का ग्रहण उपलक्षण रूप है। अर्थात् इस पद के द्वारा स्थावर , एकेन्द्रिय जाति, नरकद्विक, तिर्यंचद्विक, औदारिकसप्तक, अंतिम संहनन और निद्रापंचक इन अनुदय-बंधोत्कृष्ट उन्नीस प्रकृतियों की अन्तर्मुहूर्त कम उत्कृष्ट स्थिति उदीरणा के योग्य जानना चाहिये। इनमें से स्थावर, एकेन्द्रिय जाति और नरकद्विक का विचार किया गया, अब शेष प्रकृतियों का विचार करते हैं - कोई नारक तिर्यंचद्विक, औदारिकसप्तक और अंतिम संहनन की उत्कृष्ट स्थिति को बांधकर तत्पश्चात् मध्यम परिणाम वाला हुआ, वहां अन्तर्मुहूर्त तक रहकर पुनः तिर्यंचों में उत्पन्न होकर उक्त प्रकृतियों की उत्कृष्ट उदीरणा करता है। निद्रापंचक की भी अनुदय में उत्कृष्ट संक्लेश से उत्कृष्ट स्थिति बांधकर तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त बीतने पर निद्रा के उदय में उत्कृष्ट उदीरणा करता है तथा – तित्थयरस्स य पल्ला-संखिज्जइमे जहन्नगे इत्तो। थावरजहन्नसंतेण, समं अहिगं व बंधंतो॥३४॥ गंतूणावलिमित्तं, कसाय बारसगभयदुगंछाणं। निद्दा य, पंचगस्स य, आयावुजोयनामस्स ॥ ३५॥ शब्दार्थ – तित्थयरस्स – तीर्थंकर नाम की, य - और, पल्लासंखिजइमे – पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण, जहन्नगे - जघन्य, इत्तो - अब (इसके बाद), थावरजहन्नसंतेण - स्थावर की जघन्य स्थिति सत्ता, समं – तुल्य, अहिगं - अधिक, व – अथवा, बंधंतो – बांधता हुआ। __गंतूणावलिमित्तं – बंधावलिका के बीतने के बाद, कसाय बारसग – आदि की बारह कषाय, भयदुगंछाणं - भय और जुगुप्सा की, निद्दा य पंचगस्स - और निद्रापंचक की, य - और, आयावुजोयनामस्स – आतप और उद्योत नाम की। गाथार्थ – तीर्थंकरनाम की पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण स्थिति शेष रहने पर उत्कृष्ट स्थिति उदीरणा होती है। अब इसके बाद जघन्य स्थितिउदीरणा कहते हैं । स्थावर प्रकृति की जघन्य स्थिति सत्ता के तुल्य अथवा कुछ अधिक स्थिति को बांधता हुआ जीव बंधावलिका के पश्चात्
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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