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________________ संक्रमकरण ] शब्दार्थ असुभधुवबंध (अतिशीघ्र ), खवणाए - समय में । अट्ठकसाय आठ मध्यम कषाय, असाए और, सर्व लघु अशुभ ध्रुवबंधिनी, अत्थिरतिगे • अस्थिरत्रिक, य और, सव्वल हुं - क्षय करने को उद्यत, अहापवत्तस्स - यथाप्रवृत्तसंक्रम के, चरिमम्मि – चरम - ― - [ १२५ असातावेदनीय, य गाथार्थ आठ मध्यम कषाय, असातावेदनीय, अशुभ ध्रुवबंधिनी और अस्थिरत्रिक का जघन्य प्रदेशसंक्रम अतिशीघ्र क्षपणा के लिये उद्यत जीव यथाप्रवृत्तसंक्रम के चरम समय में करता है। - 1 विशेषार्थ अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण रूप आठ कषाय, असातावेदनीय, अशुभ ध्रुवबंधिनी कुवर्णादि नवक, उपघात रूप नामकर्म की प्रकृतियां और अस्थिर अशुभ अयश: कीर्ति रूप अस्थिरत्रिक इन बाईस प्रकृतियों में से कषायाष्टक रहित शेष चौदह प्रकृतियों का सबसे लघुकाल द्वारा अर्थात् अत्यल्प समय में शीघ्र ही कर्म क्षपण के लिये उद्यत हुये अर्थात् मास पृथक्त्व अधिक आठ वर्ष बीत जाने पर क्षपण के लिये तत्पर हुए जीव के और आठ कषायों के प्रति देशोन पूर्व कोटि तक संयम को पाल करके क्षपकश्रेणी को प्राप्त उक्त जीव के यथाप्रवृत्तकरण के चरम समय में आठ मध्यम कषायों का विध्यातसंक्रमण से और शेष चौदह प्रकृतियों का यथाप्रवृत्तसंक्रम से जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। तथ पुरिसे संजलणतिगे य धोलमाणेण चरमबद्धस्स । सगअंतिमे असाएण, समा अरई य सोगो य ॥१०३॥ शब्दार्थ - पुरिसे - पुरुषवेद, संजलणातिगे – संज्वलनत्रिक का, य - और, घोलमाणेणघोलमान योग द्वारा, चरमबद्धस्स - बंध के अंत समय में, सगअंतिमे – अपने-अपने अन्त्य संक्रम के समान, अरई – अरति, य और, सोगो - शोक, य और । समय, असाएण असाता, समा गाथार्थ - पुरुषवेद और संज्वलनत्रिक का बंध के अन्त्यसमय में घोलमान योग के द्वारा बांधे गये दलिकों का अपने-अपने अन्त्यसंक्रम के समयं जघन्य प्रदेशसंक्रम होता है। अरति और शोक का जघन्य प्रदेशसंक्रम असातावेदनीय के जघन्य प्रदेशसंक्रम के समान जानना चाहिये । - विशेषार्थ – पुरुषवेद और क्रोध, मान, माया, रूप संज्वलनत्रिक का जघन्य प्रदेशसंक्रम क्षपणा के लिये उद्यत अर्थात् क्षपक श्रेणी को प्राप्त हुए जीव के द्वारा अपने अपने बंध के चरम समय में घोलमान योग के द्वारा अर्थात् जघन्य योग से जो बंधा हुआ कर्मदलिक है, उसके चरम प्रक्षेपण के समय होता है । जिसका आशय यह है कि इन चारों प्रकृतियों के बंधविच्छेद के समय एक समय कम दो आवलिकाल में बंधे हुए दलिक को १. पंचसंग्रह में तो इन सभी बाईस प्रकृतियों के लिये देशोन पूर्वकोटि तक संयम का पालन करके ऐसा कहा है।
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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