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________________ ११० ] [ कर्मप्रकृति उपघात, अप्रशस्तविहायोगति, अपर्याप्त, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयश:कीर्ति, नीचगोत्र, ये बत्तीस अशुभ प्रकृतियां सूक्ष्मसंपरायगुणस्थान में नहीं बंधती हैं, अतः इन बत्तीस प्रकृतियों का उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम गुणितकर्मांश क्षपक के सूक्ष्मसंपराय गुणस्थान के अन्त में अर्थात् चरम समय में होता है। तथा अनिवृतिबादर गुणस्थानवर्ती गुणितकांश क्षपक के मध्यम कषायअष्टक, स्त्यानर्धित्रिक तिर्यंचद्विक, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति, सूक्ष्म साधारण, नोकषाय षट्क रूप चौबीस प्रकृतियों का अपने अपने चरम संक्षोभ अर्थात् अंतिम संक्रम के समय उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। तत्तो अणंतरागय - समयादुक्कस्स सायबंधद्धं। बंधिय असायबंधालिगंतसमयम्मि सायस्स॥ ८१॥ ... शब्दार्थ – तत्तो – उससे, अणंतरागय - अनंतरभव में आगत, समयादुक्कस्स – प्रथम समय लेकर उत्कृष्ट तक, सायबंध - सातावेदनीय बंध को, अद्धं – काल, बंधिय – बांधकर, असायबंधालिगंतसमयम्मि – असातावेदनीय की बंधावलिका के अंतिम समय में, सायस्स - सातावेदनीय का। गाथार्थ – उससे (नरकभव से) अनन्तर भव में आया हुआ जीव आने के प्रथम समय से लेकर उत्कृष्ट काल तक सातावेदनीय को बांधकर असातावेदनीय की बंधावलिका के अंतिम समय में सातावेदनीय का उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम करता है। विशेषार्थ – उस नरक भव से अनन्तर भव में आया हुआ जीव प्रथम समय से लेकर सातावेदनीय को उत्कृष्ट बंधाद्धा अर्थात् उत्कृष्ट बंध काल तक बांधकर पुनः असातावेदनीय को बांधना प्रारम्भ करता है तब असातावेदनीय की बंधावलिका के अंतिम समय में सातावेदनीय के सम्पूर्ण द्रव्य की बंधावलिका व्यतीत हो गई है, इस कारण उस समय में बंधने वाले असातावेदनीय में सातावेदनीय को यथाप्रवृत्तसंक्रम से संक्रमाते हुए सातावेदनीय का उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है। तथा – संछोभणाए दोण्हं मोहाणं वेयगस्स खणसेसे। उप्पाइय सम्मत्तं, मिच्छत्तगए तमतमाए॥८२॥ शब्दार्थ – संछोभणाए - अपने-अपने अन्त्यप्रक्षेप के समय, दोण्हं – दोनों, मोहाणं - मोहनीय प्रकृतियों का, वेयगस्स – वेदक सम्यक्त्व का, खणसेसे - अन्तर्मुहूर्त शेष रहने पर, उप्पाइय सम्मत्तं - औपशमिक सम्यक्त्व का, मिच्छत्तगए - मिथ्यात्व में गए हुए, तमतमाए – तमतमा पृथ्वी में। गाथार्थ – दोनों दर्शनमोह प्रकृतियों का संक्षोभ में - अपने अन्त्य प्रक्षेप के समय उत्कृष्ट प्रदेशसंक्रम होता है तथा तमतमा पृथ्वी में अन्तर्मुहूर्त जीवन शेष रह जाने पर औपशमिक सम्यक्त्व को उत्पन्न
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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