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________________ संक्रमकरण ] [ ६९ अब सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व की उत्कृष्ट स्थिति के संक्रम के स्वामी का कथन करते हैं - तस्संतकम्मिगो बंधि-ऊण उक्कोसगं महत्तंतो। सम्मत्तमीसगाणं, आवलिया सुद्धदिट्ठी उ॥ ३९॥ शब्दार्थ - तस्संतकम्मिगो - उन की सत्ता वाला, बंधिऊण - बांधकर, उक्कोसगं - उत्कृष्ट स्थिति, मुहत्तंतो - अन्तर्मुहूर्त हीन, सम्मत्तमीसगाणं - सम्यक्त्व और मिश्र मोहनीय की, आवलिया - आवलिका, सुद्धदिट्ठी - विशुद्ध सम्यक्त्वी, उ - और। गाथार्थ – इन दोनों (सम्यक्त्वमोहनीय और मिश्रमोहनीय) प्रकृतियों की सत्ता वाला जीव मिथ्यात्व की उत्कृष्ट स्थिति को बांधकर विशुद्ध सम्यग्दृष्टि होकर अन्तर्मुहूर्त हीन स्थिति को संक्रमता है तथा सम्यक्त्वमोहनीय और मिश्रमोहनीय की एक आवलिका हीन स्थिति को संक्रमता है। विशेषार्थ – सम्यक्त्व और सम्यमिथ्यात्व कर्म की सत्ता वाला मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यात्व की सत्तर कोडाकोडी सागरोपम प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति को बांधकर उसके अन्तर्मुहूर्त पश्चात् मिथ्यात्व से च्युत होकर सम्यक्त्व को प्राप्त होता है। इसलिये वह शुद्धदृष्टि अर्थात सम्यग्दृष्टि जीव एक अन्तर्मुहूर्त कम मिथ्यात्व की उत्कृष्ट स्थिति को सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व में संक्रमाता है। इसलिये संक्रमावलिका के बीत जाने पर उदयावलि से ऊपर की सम्यक्त्व की स्थिति को अपवर्तनाकरण से स्वस्थान में संक्रमाता है और सम्यग्मिथ्यात्व की स्थिति को भी संक्रमावलि के बीत जाने पर उदयावलि से ऊपर सम्यक्त्व में संक्रमाता है और अपवर्तित भी करता है। इसलिये इस प्रकार दर्शनमोहनीय की तीनों प्रकृतियों की उत्कृष्ट स्थिति के संक्रम का स्वामी सम्यग्दृष्टि जीव ही होता है। इस प्रकार उत्कृष्ट स्थिति के संक्रम के स्वामियों को समझना चाहिये। अब जघन्य स्थितिसंक्रम के स्वामी का प्रतिपादन करते हैं - दसणचउक्कविग्घा - वरणं समयाहिगालिगा छउमो। निदाणावलिगदुगे, आवलिय असंखतमसेसे॥ ४०॥ शब्दार्थ – दंसणचउक्क - दर्शनचतुष्क, विग्यावरणं - अंतराय और ज्ञानावरण, समयाहिगालिगा- समयाधिक आवलिका प्रमाण, छउमो - छद्मस्थ (क्षीणकषायी), निहाणं - निद्राद्विक, आवलिदुगे – दो आवलि, आवलिय असंखतम – आवलि के असंख्यातवें भाग, सेसे – शेष रहने पर। गाथार्थ – दर्शनावरणचतुष्क, अन्तरायपंचक और ज्ञानावरणपंचक का स्वामी एक समय आवलि शेष रहे ऐसा छद्मस्थ है और निद्राद्विक का आवलि का असंख्यातवां भाग अधिक दो आवलि शेष रह जाने पर वही छद्मस्थ स्वामी होता है।
SR No.032438
Book TitleKarm Prakruti Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year2002
Total Pages522
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size39 MB
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