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________________ कर्मप्रकृति पर्याप्तियों को उत्पन्न करने में समर्थ होता है, वह पर्याप्त नामकर्म है । इसके विपरीत अपर्याप्त नामकर्म कहलाता है कि जिसके उदय से जीव अपने योग्य पर्याप्तियों के निर्माण करने में समर्थ नहीं होता है। प्रत्येक-साधारण शरीर--यदुदयात् प्रतिजीवं भिन्नशरीरमपजायते तत् प्रत्येकनाम-जिसके उदय से प्रत्येक जीव का भिन्न-भिन्न शरीर उत्पन्न होता है, वह प्रत्येक नामकर्म है। यदुदयादनन्तानां जीवनामेकं शरीरं भवति तत्साधारणनाम--जिसके उदय से अनन्त जीवों का एक शरीर होता है, वह साधारण नामकर्म है । ___ शंका--प्रवचन (आगम) में कपित्थ (कबीट-कथा), अश्वत्थ (वट), पीलू (पिलखन) आदि वृक्षों के मूल, स्कन्ध, त्वक् (छाल), शाखा आदि प्रत्येक असंख्यात-असंख्यात जीव वाले कहे गये हैं, किन्तु मूल आदि देवदत्त के शरीर के समान अखंडित एक शरीर के आकार रूप पाये जाते हैं, तब उन कपित्थ आदि के प्रत्येकशरीरपना कैसे सम्भव है ? क्योंकि उनमें प्रत्येक जीव के पृथक्-पृथक् शरीरभेद का अभाव है । समाधान--यह कहना युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि उन मूल आदि में भी असंख्यात जीवों के भिन्न-भिन्न शरीर माने गये हैं । केवल श्लेषद्रव्य से मिश्रित वहुत-से सरसों की वत्ती के समान प्रवल राग-द्वेष से संचित विचित्र प्रत्येक नामकर्म के पुद्गलों के उदय से उन जीवों का परस्पर मिला हुआ शरीर होता है ।' ___ स्थिर-अस्थिर--यदुदयाच्छिरोऽस्थिदन्तादीनां शरीरावयवानां स्थिरता भवति तत् स्थिरनाम, तद्विपरीतमस्थिरनाम, यदुदवाज्जिहादीनां शरीरावयवानामस्थिरता--जिसके उदय से शिर, हड्डी, दांत आदि शरीर के अवयवों की स्थिरता होती है, वह स्थिर नामकर्म है। इसके विपरीत अस्थि र नामकर्म है कि जिसके उदय से जिह्वादि शरीर के अवयवों की अस्थिरता रहती है । शुभ-अशुभ--यदुदयान्नाभेरुपरितना अवयवाः शुभा जायन्ते तच्छ भनाम, तद्विपरीतमशुभनाम, यदुदयानाभेरधस्तनाः पादादयोऽवयवा अशुभा भवन्ति--जिसके उदय से नाभि से ऊपर के अवयव शुभ होते हैं, वह शुभ नामकर्म है और इससे विपरीत अशुभ नामकर्म कहलाता है कि जिसके उदय से नाभि से नीचे के पैर आदि अवयव अशुभ होते हैं । जैसे कि शिर से स्पर्श किये जाने पर मनुष्य को संतोष प्राप्त होता है और पैर से स्पर्श किये जाने पर क्रोधाभिभूत हो जाता है। कामिनी के पादस्पर्श होने पर भी कामी पुरुष जो संतोष का अनुभव करता है, वह कामरागजनित मोहनिमित्तक है, वास्तव नहीं। अतः अशुभ नामकर्म के उक्त लक्षण में व्यभिचार, दोष नहीं है ।। सुस्वर-दुःस्वर-यदुदयाज्जीवस्वरः श्रोतृप्रीतिहेतुर्भवति तत्सुस्वरनाम, तद्विपरीतं दुःस्वरनाम, यदुदयात्स्वरः श्रोतृणामप्रीतिहेतुर्भवति--जिसके उदय से जीव का स्वर श्रोताओं को प्रीति का कारण होता है, वह सुस्वर नामकर्म है । इसके विपरीत दुःस्वर नामकर्म है कि जिसके उदय से जीव का स्वर श्रोताओं को अप्रीति का कारण होता है। १. साधारण और प्रत्येक नामकर्म के विशेष स्पष्टीकरण के लिये परिशिष्ट देखिये।
SR No.032437
Book TitleKarm Prakruti Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShivsharmsuri, Acharya Nanesh, Devkumar Jain
PublisherGanesh Smruti Granthmala
Publication Year1982
Total Pages362
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size31 MB
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