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ओ पाठ भगवती रो हीरो-सो परखो,
है अभय-वृत्ति रो अर्थ समर्थन सरखो।। २७. कर हृदय-कपाट अनावृत बात विचारो,
ज्यूं जिज्ञासा रो समाधान हो सारो। अब जयाचार्य रो 'भ्रमविध्वंस' निकाळो,
सिद्धांतसार ओ कनीराम-कृत भाळो।। २८. अनुकूल सूत्र स्यूं कुण प्रतिकूल पड़े है?
कुण बहै बेधड़क कुण अधबीच अडै है? अक्षर-अक्षर रो मेळ करो मिल तीनों,
निज भ्रांति हरो, मत सत्य छदम स्यूं छीनो।। २६. विस्मित प्रताप गुरु प्रौढ़-प्रताप-समक्षे,
जति-जुगल प्रफुल्लित-नयन वदै शुभलक्षे। इणमें तो जयाचार्य रो 'भ्रमविध्वंसन', आगम-अनुसारी भारी भ्रम-विध्वंसन, 'सिद्धांतसार' सिद्धान्त-सार नहिं पायो, पायो गुरु-कृपया तत्त्व हृदय उलसायो।।
सुजन जन! सांभळो वारु कालूयशोविलास ।
३०. सहु सांभळतां गुरु कहै जी, समझी बात यथार्थ।
म्है मानां तिण कारणे जी, म्हारो उद्यम सार्थ ।। ३१. कालूयशोविलास री जी; निमल सातमी ढाळ। ___ पुण्यपोरसो गुरु मिलै जी, जिणरो भाग्य विशाल ।।
१. भगवई श. ८ सू. ४५० २. भगवती सूत्र अभयदेवकृत वृत्ति पत्र ४१८ ___ देशं स्तोकमंशं मोक्षमार्गस्याराधयतीत्यर्थः ३. लय : जम्बू! कह्यो मान लै रे
१३८ / कालूयशोविलास-१