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________________ भगवती सूत्र ११३. भंते ! सातवां तनुवात कितने वर्ण, यावत् कितने स्पर्श वाला प्रज्ञप्त है । गौतम ! पांच वर्ण, दो गंध, पांच रस और आठ स्पर्श वाला प्रज्ञप्त है । श. १२ : उ. ५ : सू. ११३-११७ इसी प्रकार जैसे सातवें तनुवात की वक्तव्यता, वैसे ही सातवें घनवात, घनोदधि और पृथ्वी की वक्तव्यता । छठा अवकाशान्तर वर्ण-रहित है । तनुवात यावत् छठी पृथ्वी- इनमें आठ स्पर्श हैं । इसी प्रकार जैसे सातवीं पृथ्वी की वक्तव्यता, वैसे ही यावत् प्रथम पृथ्वी की वक्तव्यता । जम्बूद्वीप द्वीप यावत् स्वयंभूरमण समुद्र, सौधर्म- कल्प यावत् ईषत्प्राग्भारा - पृथ्वी, नैरयिकावास यावत् वैमानिकावास - ये सभी आठ स्पर्श वाले प्रज्ञप्त हैं । ११४. भंते ! नैरयिकों के कितने वर्ण यावत् कितने स्पर्श प्रज्ञप्त हैं ? - गौतम ! वैक्रिय और तैजस शरीर की अपेक्षा पांच वर्ण, दो गंध, पांच रस और आठ स्पर्श वाले प्रज्ञप्त हैं । कर्म-शरीर की अपेक्षा पांच वर्ण, दो गंध, पांच रस और चार स्पर्श वाले प्रज्ञप्त हैं। जीव की अपेक्षा वर्ण-रहित यावत् स्पर्श-रहित प्रज्ञप्त हैं। इसी प्रकार यावत् स्तनितकुमारों की वक्तव्यता । ११५. पृथ्वीकायिकों की पृच्छा । गौतम ! औदारिक- और तैजस शरीर की अपेक्षा पांच वर्ण यावत् आठ स्पर्श वाले प्रज्ञप्त हैं। कर्म शरीर की अपेक्षा नैरयिकों की भांति वक्तव्यता । जीव की अपेक्षा नैरयिकों की भांति वक्तव्यता। इसी प्रकार यावत् चतुरिन्द्रिय की वक्तव्यता, इतना विशेष है - वायुकायिक औदारिक, वैक्रिय - और तैजस शरीर की अपेक्षा पांच वर्ण यावत् आठ स्पर्श वाले प्रज्ञप्त हैं, शेष नैरयिकों की भांति वक्तव्य हैं। पंचेन्द्रिय तिर्यग्योनिक वायुकायिक की भांति वक्तव्य हैं । ११६. मनुष्यों की पृच्छा । वे औदारिक, वैक्रिय, आहारक और तैजस शरीर की अपेक्षा पांच वर्ण, यावत् आठ स्पर्श वाले प्रज्ञप्त हैं। कर्म-शरीर और जीव की अपेक्षा वे नैरयिकों की भांति वक्तव्य हैं। वाणमन्तर, ज्योतिष्क- और वैमानिक -देव नैरयिकों की भांति वक्तव्य हैं। धर्मास्तिकाय यावत् पुद्गलास्तिकाय - ये सभी वर्ण-रहित हैं, इतना विशेष है - पुद्गलास्तिकाय पांच वर्ण, दो गंध, पांच रस और आठ स्पर्श वाला प्रज्ञप्त है । ज्ञानावरणीय यावत् अन्तराय - ये चार स्पर्श वाले प्रज्ञप्त हैं। ११७. भंते ! कृष्ण-लेश्या कितने वर्ण यावत् कितने स्पर्श वाली प्रज्ञप्त है ? द्रव्य - लेश्या की अपेक्षा पांच वर्ण यावत् आठ स्पर्श वाली प्रज्ञप्त है । भाव-लेश्या की अपेक्षा वर्ण-रहित, गन्ध-रहित, रस-रहित और स्पर्श-रहित प्रज्ञप्त हैं। इसी प्रकार यावत् शुक्ल- लेश्या की वक्तव्यता । सम्यग्दृष्टि, मिथ्या-दृष्टि, सम्यग् - मिथ्या दृष्टि, चक्षु-दर्शन, अचक्षु - दर्शन, अवधि - दर्शन, केवल दर्शन, आभिनिबोधिक ज्ञान यावत् (भ. २/१३७) विभंग ज्ञान, आहार-संज्ञा यावत् परिग्रह - संज्ञा- ये सभी वर्ण-रहित, गन्ध-रहित, रस-रहित और स्पर्श-रहित हैं । ४६७
SR No.032417
Book TitleBhagwati Sutra Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanakprabhashreeji, Mahendrakumar Muni, Dhananjaykumar Muni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2013
Total Pages590
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size15 MB
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