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भगवती सूत्र
श. १६ : उ. ६ : सू. ९१
१. महान् घोर रूप वाले दीप्तिमान एक ताल पिशाच (ताड़ जैसे लंबे पिशाच) को स्वप्न में पराजित हुआ देखकर प्रतिबुद्ध हुए। २. श्वेत पंखों वाले एक बड़े पुंस्कोकिल को स्वप्न में देखकर प्रतिबुद्ध हुए। ३. चित्र-विचित्र पंखों वाले एक बड़े पुंस्कोकिल को स्वप्न में देखकर प्रतिबुद्ध हुए। ४. सर्वरत्नमय दो बड़ी मालाओं को स्वप्न में देखकर प्रतिबुद्ध हुए। ५. एक महान् श्वेत गोवर्ग को स्वप्न में देखकर प्रतिबुद्ध हुए। ६. चिहुं ओर कुसुमित एक बड़े पद्म-सरोवर को स्वप्न में देखकर प्रतिबुद्ध हुए। ७. स्वप्न में हजारों ऊर्मियों और वीचियों से परिपूर्ण एक महासागर को भुजाओं से तीर्ण हुआ देखकर प्रतिबुद्ध हुए। ८. तेज से जाज्वल्यमान एक महान् सूर्य को स्वप्न में देखकर प्रतिबुद्ध हुए। ९. स्वप्न में भूरे व नीले वर्ण वाली अपनी आंतों से मानुषोत्तर पर्वत को चारों ओर से आवेष्टित और परिवेष्टित हुआ देखकर प्रतिबुद्ध हुए। १०. स्वप्न में महान् मंदर पर्वत की मंदर चूलिका पर अवस्थित सिंहासन के ऊपर अपने आपको बैठे हुए देखकर प्रतिबुद्ध हुए। १. श्रमण भगवान् महावीर महान् घोर रूप वाले दीप्तिमान् एक ताल-पिशाच को स्वप्न में पराजित हुआ देखकर प्रतिबुद्ध हुए, उसके फलस्वरूप श्रमण भगवान् महावीर ने मोहनीय-कर्म को मूल से उखाड़ फेंका। २. श्रमण भगवान् महावीर श्वेत पंखों वाले एक बड़े पुंस्कोकिल को स्वप्न में देखकर प्रतिबुद्ध हुए, उसके फलस्वरूप श्रमण भगवान् महावीर शुक्ल-ध्यान को प्राप्त हुए। ३. श्रमण भगवान महावीर चित्र-विचित्र पंखों वाले एक बड़े पुंस्कोकिल को स्वप्न में देखकर प्रतिबुद्ध हुए, उसके फलस्वरूप श्रमण भगवान् महावीर ने स्व-समय और पर-समय का निरूपण करने वाले द्वादशांग गणिपिटक का आख्यान, प्रज्ञापन प्ररूपण, दर्शन, निदर्शन और उपदर्शन किया, जैसे- आचार, सूत्रकृत् यावत् दृष्टिवाद । ४. श्रमण भगवान् महावीर सर्वरत्नमय दो बड़ी मालाओं को स्वप्न में देखकर प्रतिबुद्ध हुए, उसके फलस्वरूप श्रमण भगवान् महावीर ने इन दो प्रकार के धर्मों की प्रज्ञापना की, जैसे–अगार-धर्म और अनगार-धर्म। ५. श्रमण भगवान् महावीर एक महान् श्वेत गोवर्ग को स्वप्न में देखकर प्रतिबुद्ध हुए, उसके फलस्वरूप श्रमण भगवान् महावीर के चतुर्वर्णात्मक श्रमण संघ हुआ, जैसे-श्रमण, श्रमणी, श्रावक और श्राविका। ६. श्रमण भगवान् महावीर चिहुं ओर कुसुमित एक बड़े पद्म सरोवर को स्वप्न में देखकर प्रतिबुद्ध हुए, उसके फलस्वरूप श्रमण भगवान् महावीर ने चार प्रकार के देवों का प्रज्ञापन किया, जैसे-भवनपति, वाणमंतर, ज्योतिष्क और वैमानिक।
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