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________________ २४ - प्रज्ञा संचयन श्रीमद् के कुछ परिचित मित्र, संबंधीजन और शायद आश्रयदाता भी कट्टर मूर्तिविरोधी स्थानकवासी थे । वे स्वयं भी प्रथम तो उसी मत के थे, परंतु जब उन्हें प्रतिमा के विषय में सत्य समझ में आया तब किसी की परवाह किये बिना प्रतिमासिद्धि हेतु बीस वर्ष की आयु में उन्होंने जो लिखा है, वह उनके विचार गांभीर्य का द्योतक है । जिज्ञासु जनों को (२०) वह मूल लेख पढ़कर ही परीक्षा करनी चाहिए। उसी प्रकार केवल जैन परंपरा के अभ्यासी द्वारा श्रीमद् की विचारशीलता की परीक्षा करने हेतु - इस युग में क्षायिक सम्यक्त्व संभव है या नहीं - इस विषय में की गई चर्चा (३२३) उन्हीं के शब्दों में पढ़ने योग्य है। विशिष्ट लेखादि श्रीमद् के लिखित साहित्य को तीन विभागों में वर्गीकृत कर के उनमें से सामान्य या महान - किसी भी प्रकार की - विशेषता से युक्त कृतियों का यहाँ परिचय देना चाहता हूँ। प्रथम विभाग में मैं ऐसी कृतियों का समावेश करता हूँ जो गद्य हों या पद्य परंतु जिनकी रचना श्रीमद् ने एक स्वतंत्र या अनुवादित कृति के रूप में ही की हो। द्वितीय विभाग में मैं उनकी उन कृतियों को समाविष्ट करता हूँ जो किसी जिज्ञासु के प्रश्नों के उत्तर के रूप में या ऐसे ही किसी संदर्भ में लिखी गई हों। तृतीय विभाग में ऐसे लेख आते हैं जो स्वतः चिंतन करते हुए Note के रूप में लिखे गये हों या उनके उपदेश में से उद्भुत हुए हों। ___ अब प्रथम विभाग की कृतियों को देखें: (१) पुष्पमाला - यह श्रीमद्जी की उपलब्ध कृतियों में से सर्वप्रथम कृति है। यह किसी संप्रदाय विशेष को लक्ष्य कर के नहीं, बल्कि सर्वसाधारण नैतिकधर्म तथा कर्तव्य की दृष्टि से लिखी गई है। माला में १०८ मनके होते हैं, उसी प्रकार यह कृति १०८ नैतिक पुष्पों से गुम्फित है तथा किसी भी धर्म, जाति या पंथ के स्त्री एवं पुरुष के लिए गले में धारण करने योग्य अर्थात् नित्य पठनीय एवं मननीय है। इस कृति की अन्य विशेषताएँ भी हैं लेकिन इसकी ध्यान आकर्षित करनेवाली विशेषता तो यह है कि वह सोलह वर्ष से भी कम आयु में लिखी गई है! एक बार किसी बातचीत के दरम्यान गाँधीजी ने इस कृति के विषय में मुझे एक ही वाक्य कहा था, जो उसकी विशेषता का परिचय कराने के लिए पर्याप्त है और वह वाक्य था - "अरे, वह पुष्पमाला तो पुनर्जन्म की साक्षी है।"
SR No.032298
Book TitlePragna Sanchayan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPratap J Tolia
PublisherJina Bharati
Publication Year2011
Total Pages182
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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