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________________ तितली और मुक्ति सर पटकती पर फरफराती, टकरा रही थी, तितली खिड़की से : बंद द्वारों से बाहर जाने, मुक्ति पाने । बहुत मथा, कुछ काल बीता, पर निकल न पाई और लगी रही वह टकराने 1 आया अचानक पथिकः कोई; खोली खिड़की, उड़ गई सोई । जीवात्मा भी ऐसे ही टकराती रहती : सर पटकती, दर दर भटकती, मन मसोसती, तन खसोसती, हाथ मचलती, पाँव कुचलती, भीतर झुलसती, बाहर उलझती ... ! पर जब तक मिले न हाथ को थामनेवाला, बंद द्वारों को खोलनेवाला, लंबी नींद को तोड़नेवाला ज्ञानी, सद्गुरु, राही, संग युक्ति, तब तक क्या सम्भव है मुक्ति ? अनंत की अनुगूंज २२
SR No.032297
Book TitleAnantki Anugunj
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPratap J Tolia
PublisherVardhaman Bharati International Foundation
Publication Year1972
Total Pages54
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
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