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________________ जैनधर्म की कहानियाँ भाग-15/58 सर्वस्व दान 11 सर्वस्व समर्पण एक पुराना मन्दिर था। दरारें पड़ी थी। खूब जोर से वर्षा हुई और हवा चली । मन्दिर का बहुत बड़ा भाग लड़खड़ाकर गिर पड़ा। उस दिन एक विद्वान वर्षा में उस मन्दिर में आकर ठहरे थे । भाग्य से वे जहाँ बैठे थे, उधर का कोना बच गया । विद्वान को चोट नहीं लगी । विद्वान ने सबेरे पास के बाजार में जाकर चन्दा करना प्रारम्भ किया । उन्होंने सोचा ‘मेरे रहते भगवान का मन्दिर गिरा है तो इसे बनवाकर ही मुझे कहीं जाना चाहिये ।' बाजार वालों में श्रद्धा थी । 'उन्होंने राजा से लेकर गरीब तक घर-घर जाकर चन्दा एकत्र किया। मन्दिर बन गया । भगवान की मूर्ति भारी उत्सव के साथ विराजमान हुई । सहभोज हुआ, सबने आनन्द से भोजन किया । सहभोज के दिन शाम को राजा की उपस्थिति में सभा हुई । विद्वान दातारों को धन्यवाद देने के लिये खड़े हुए। उनके हाथ में एक कागज था। उसमें लम्बी सूची थी। उन्होंने कहा - सबसे बड़ा दान एक बुढ़िया माता ने दिया है । वे स्वयं आकर दे गयी थीं। ' लोगों ने साचा कि अवश्य किसी बुढ़िया ने सौ दौ सौ रुपये दिये होंगे। कई लोगो नें सौ रुपये दिये थे। लेकिन सबको बड़ा आश्चर्य हुआ । जब विद्वान ने कहा - 'उन्होंने मुझे चार आने पैसे और थोड़ा सा आटा दिया है।' लोगों ने समझा ये हँसी कर रहे हैं।
SR No.032264
Book TitleJain Dharm Ki Kahaniya Part 15
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRameshchandra Jain
PublisherAkhil Bharatiya Jain Yuva Federation
Publication Year2014
Total Pages84
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size13 MB
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