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जैनधर्म की कहानियाँ भाग-६/१४ जाप भी उसमें नहीं था; उसमें तो आत्मस्वरूप की भावना से चैतन्य की किसी अपारशान्ति का वेदन था कि जिस वेदन की वीतरागता में उनका आत्मा दो क्षण के लिए राग-द्वेष की परिणति से भिन्न हो जाता था। ___ ऐसे तो उन महात्मा का जीवन राग-द्वेष से परे था, परन्तु शुद्धोपयोग द्वारा निर्विकल्प होकर वे जिस आत्मानन्द का वेदन करते थे, वह एक अनिर्वचनीय विशिष्ट दशा थी। सामायिक के समय वे कैसा आत्मचिन्तन करते थे, वह उन्हीं के श्रीमुख से सुनें। .. वीर राजकुमार सदा ऐसे शुद्धात्मा की भावना भाते थे। विलक्षण थी उनकी
आत्मधुन....और विशुद्ध थी उनकी ध्यानधारा ! कभी-कभी अर्धरात्री के समय अचानक चैतन्य की धुन लगने से वे ध्यान में लीन हो जाते थे। उन्हें राजभवन में आराम से निद्रा लेना अच्छा नहीं लगता था। राजप्रासाद की दीवारों के बन्धन तोड़कर तथा राग को भी छोड़कर, अनन्त तीर्थंकरों की पंक्ति में प्रवेश करने की
अधिकाधिक उर्मियाँ उनके अन्तर में उल्लसित होती थीं। स्वर्गलोक से आने वाले दिव्य वस्त्राभूषण एवं रसपूर्ण भोजन के प्रति वे नीरस होते जा रहे थे; उनका हृदय अब शीघ्र ही मोक्ष प्राप्ति हेतु तत्पर हो रहा था।
दूसरी ओर त्रिशला माता भी पुत्र के मुख से आत्मवैभव की बातें सुन-सुनकर हर्षविभोर हो जाती और कहतीं...बेटा, तू सचमुच पहले से ही इस राजभवन में रहकर भी परमात्मा की भाँति अलिप्त रहता था। तेरी ज्ञानचेतना तुझ में ही भीतरभीतर कोई परमात्म लीला करती रहती थी....वह हम बहुत दिनों से देख रहे थे....अब तो कुछ समय पश्चात् सारा जगत भी तुम्हारी ज्ञानचेतना की अद्भुत परमात्म लीला देखकर धन्य होगा।
'धन्य माता! तुम्हारी ज्ञाननेतना की प्रतीति यथार्थ है। तुम स्वयं ज्ञानचेतना के मधुर आनन्द स्वाद का आस्वादन करनेवाली हो। मैं इस भव में, तो तुम उस भव में....अवश्य मोक्ष साधने वाली हो।'
बेटा ! तुम्हारी वीरता भरी मीठी-मीठी बातों से मैं मुग्ध हो जाती हूँ....ऐसा लगता है कि तुम्हारी बातें सुनती ही रहूँ; किन्तु रह-रहकर मन में ममता की लहर आ जाती है कि तुम सचमुच यह सब छोड़कर चले जाओगे?... फिर मुझे 'माँ'