SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 55
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ - जैनधर्म की कहानियाँ भाग-६/५३ भगवान महावीर : पंचकल्याणक यत्स्वर्गावतरोत्सवे यदभवत् जन्माभिषेकोत्सवे, यद्दीक्षाग्रहणोत्सवे यदखिल ज्ञानप्रकाशोत्सवे । यत् निर्वाणगमोत्सवे जिनपते: पूजाद्भुत तद्रवे; संगीत: स्तुति मंगले प्रसरतां में सुप्रभातोत्सवः॥ सर्वज्ञ भगवान महावीरस्वामी के पंचकल्याणक जगत का कल्याण करें! हे जिनेन्द्र ! आपश्री के मंगल पंचकल्याणक प्रसंग पर आपके शुद्धात्मा की दिव्य महिमा को हृदयंगम करके इन्द्रादि आराधक भक्तजनों ने अद्भुत पूजनस्तुतिपूर्वक जो मंगल उत्सव किया, उसके मधुर संस्मरण आज भी आनन्द उत्पन्न कर रहे हैं, मानों आप ही मेरे हृदय में विराज कर बोल रहे हों; ऐसे आपके मंगल चिन्तनपूर्वक आपके पंचकल्याणक का भक्ति सहित आलेखन करता हूँ। जिन भावों से स्वर्ग के हरि ने आपकी भक्ति की थी, उन्हीं भावों से मैं इस मनुष्य लोक का हरि भी आपकी भक्ति करता हूँ। अहो ! त्रिकाल मंगलरूप उन तीर्थंकरों को नमस्कार हो कि जिनके पंचकल्याणक अनेक जीवों को कल्याण के कारण हुए हैं। भगवान महावीर के आत्मा का भव-भ्रमण पूरा हुआ; अब अन्तिम तीर्थंकर अवतार में उनके पंचकल्याणक होते हैं। उन महात्मा का अनादिकाल के भव समुद्र का किनारा आ चुका है और अनेक भव से चल रही वृद्धिंगत आत्मसाधना के प्रताप से महामंगल मोक्षपद बिल्कुल निकट आ गया है, जिन्होंने चैतन्यसुख का आस्वादन किया है - ऐसे उन महात्मा को देवलोक के दिव्यवैभव लुभा नहीं सके। मोक्ष के साधक को स्वर्ग का भव कैसे ललचा सकेगा ? वीतरागता के साधक को राग के फल कहाँ से अच्छे लगेंगे ? उन मंगल आत्मा को १६वें स्वर्ग से इस भरतक्षेत्र में अवतरित होने में जब छह मास शेष थे, तब वैशाली-कुण्डग्राम में रत्नवृष्टि होने लगी। अनन्त तीर्थंकरों के मंगलविहार से पावन अपना यह भारत देश; ढाई हजार वर्ष पूर्व वैशाली गणतन्त्र का कुण्डपुर (कुण्डग्राम) अति शोभायमान था। उससमय भगवान पार्श्वनाथ तीर्थंकर का शासन चल रहा था और उनके परम उपासक सिद्धार्थ महाराजा वैशाली गणराज्य के अधिपति थे। उनकी महारानी प्रियकारिणी
SR No.032258
Book TitleJain Dharm Ki Kahaniya Part 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHaribhai Songadh, Vasantrav Savarkar Rameshchandra Jain
PublisherAkhil Bharatiya Jain Yuva Federation
Publication Year2014
Total Pages148
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy