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________________ जैनधर्म की कहानियाँ भाग - ६/४४ अपने चरित्र नायक का परिणमन अब मोक्ष की ओर तीव्रगति से हो रहा है। आठवें स्वर्ग से एक समय में असंख्य योजन की गति से वे मनुष्य लोक में आये और उज्जयिनी नगरी में वज्रधर राजा के पुत्ररूप में अवतरित हुए; उनका नाम हरिषेण था | एकबार जैनाचार्य श्रुतसागरजी महाराज उज्जयिनी नगरी में पधारे; उनका वैराग्य रस से सराबोर धर्मोपदेश सुनकर महाराजा वज्रधर संसार से विरक्त हुए और हरिषेण कुमार को राज्य सौंपकर जिनदीक्षा ग्रहण कर ली। हरिषेण कुमार जो कि सम्यग्दर्शन तो पूर्वजन्म से ही लेकर आये हैं, उन्होंने श्रावक के बारह व्रत धारण किये । पाप के कारणभूत ऐसे विशाल राज्य में रहने पर भी वे महात्मा कमलवत् ऐसे अलिप्त थे कि पाप उन्हें स्पर्श तक नहीं करते थे; उनका चित्त सर्वत्र नि:स्पृह रहता था । अहो ! साधक की ज्ञानचेतना कोई अद्भुत आश्चर्यकारी है। जिसप्रकार चन्दन सर्पों के बीच रहकर भी अपनी शीतलता को नहीं छोड़ता अर्थात् विषरूप नहीं होता, उसीप्रकार विष समान विभिन्न राग - संयोगों के बीच रहने पर भी धर्मात्मा की ज्ञानचेतना अपने शान्तस्वभाव को छोड़कर राग-रूप नहीं होती । राजा हरिषेण एक दिन संसार से विरक्त हुए और जिनदीक्षा लेकर तपोवन में जाकर प्रशान्तरस में निमग्न हो गये। उन मुनिराज ने आयु के अन्त में समाधिपूर्वक शरीर का त्याग करके महाशुक्र स्वर्ग को अलंकृत किया। वे प्रीतिवर्धन विमान में सोलह सागर आयु के धारी देव हुए। विदेहक्षेत्र में प्रियमित्र चक्रवर्ती पश्चात् बारहवे स्वर्ग में देव ( चौथा और तीसरा पूर्वभव) अपने चरित्र नायक भगवान महावीर अन्तिम भव में धर्मचक्री होंगे; उससे पूर्व वे विदेहक्षेत्र में राजचक्रवर्ती हुए। स्वर्ग से वे महात्मा विदेह की क्षेमद्युति नगरी में धनंजय राजा के घर पुत्ररूप में उत्पन्न हुए, उनका नाम था प्रियमित्र । एक दिन राजा धनंजय ने संसार से विरक्त होकर पुत्र प्रियमित्र को राज्य सौंप दिया और स्वयं स्वभावमय सम्यग्दर्शन - ज्ञान - चारित्र को ग्रहण करके तप द्वारा सुशोभित हुए। राज्यलक्ष्मी छोड़कर तपलक्ष्मी द्वारा वे अधिक शोभायमान हो रहे थे ।
SR No.032258
Book TitleJain Dharm Ki Kahaniya Part 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHaribhai Songadh, Vasantrav Savarkar Rameshchandra Jain
PublisherAkhil Bharatiya Jain Yuva Federation
Publication Year2014
Total Pages148
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
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