SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 24
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ जैनधर्म की कहानियाँ भाग - ६ / २२ (अहा ! अपने चरित्र नायक इस भव में पहली बार धर्म को प्राप्त हुए । चैतन्य की आराधना द्वारा उन्होंने इस भव में भवकट्टी की ; परन्तु उस आराधना में एकबार निदान शल्य के कारण बीच में भंग पड़ गया । पश्चात् मोक्ष की अखण्ड आराधना उन्होंने सिंह के भव में प्रारम्भ की, इसलिये शास्त्रकारों ने सिंह के भव में सम्यक्त्व-प्राप्ति का वर्णन मुख्यरूप से किया है, जो हमें अखण्ड-आराधना की प्रेरणा देता है ।) दीक्षा लेने के पश्चात् राजा विशाखभूति तो निःशल्य रत्नत्रय का पालन करके दसवें स्वर्ग में गये । इधर राजगृही में उनका पुत्र नन्दविशाख, जिसके अन्याय कारण विश्वनन्दि ने राज्य छोड़कर दीक्षा ली थी, वह नन्द - विशाख शक्तिहीन तथा पुण्यहीन था । कुछ ही समय पश्चात् एक राजा ने उसका राज्य जीत लिया और वह रास्ते पर भटकता हुआ भिखारी बन गया। राजा मिटकर रंक हो गया। वह भीख माँगता हुआ मथुरा की गलियों में घूमने लगा । अब अपने चरित्र नायक महात्मा विश्वनन्दिका क्या हुआ ? वह देखें- उपवन का मोह छोड़कर मुनि हुए विश्वनन्दि मुनि यथाशक्ति रत्नत्रय धर्म का पालन करते थे; अनेक बार उपवासादि भी करते थे। एकबार उन्होंने मासोपवास किये। जैनमुनि उपवास में पानी भी नहीं पीते; तथा उपवास के अतिरिक्त दिनों में भी मात्र एक ही बार आहार-जल ग्रहण करते हैं। इसप्रकार अन्न-जल रहित मासोपवासी विश्वनन्दि मुनिराज मथुरा नगरी में पारणा हेतु पधारे और नीचे देखकर मार्ग में चल रहे थे। इतने में एक बैल ने उन्हें सींग मारा और वे धरती पर गिर पड़े। ठीक उसीसमय राज्यभ्रष्ट नन्दविशाख वहाँ एक वेश्या के घर के पास खड़ा था । उसने वह दृश्य देखा और पूर्व के वैर का स्मरण करके अट्टाहास पूर्वक कटाक्ष किया कि रे विश्वनन्दि ! कहाँ गया तेरा वह बल ? तूने तो विशाल खम्भा उखाड़ कर सारी सेना को जीत लिया था और मैं भाग कर वृक्ष पर चढ़ गया था तब पूरे वृक्ष को अपने बाहुबल से उखाड़ दिया था । उसके बदले आज एक बैल के धक्के से गिर पड़ा है। कहाँ गया तेरा वह बाहुबल ? एक ओर मासोपवास की अशक्ति के कारण बैल के धक्के से गिर पड़ना और दूसरी ओर भाई द्वारा पूर्वकालिक वैर का स्मरण करके कटाक्ष करना... उससे विश्वनन्दि मुनि की सुषुप्त कषाय जागृत हो उंठी; क्रोधावेश में वे अपने
SR No.032258
Book TitleJain Dharm Ki Kahaniya Part 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHaribhai Songadh, Vasantrav Savarkar Rameshchandra Jain
PublisherAkhil Bharatiya Jain Yuva Federation
Publication Year2014
Total Pages148
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size17 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy