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________________ श्री प्राचीनस्तवनावली . . . . [७५ ३॥ ए म्हारो ए पारको हो० करे न कोइ विचार ॥ तो पिण आवी न जूडे हो० आगल परषदा वार ॥ को०॥४॥ सुख दुःख पिण पूछ नहीं हो तो पिण तुम सुप्रीत ॥ ऋषभानन सहु को कहे हो. ए तुझ नवली रीत ॥ को०॥५॥ नयणे नयण निहालता हो मोहे सहु असमाज। आपण पे अलगो रहे हो. मोह थकी जिनराज ॥ को०॥६॥ ढाल ८ आठमी रूडो म्हारो गुरूजी कलपडो ॥ ए देशी ॥ अनंतवीरज में ताहरो, नाम सुण्यो जिनराज । हिव जिम तिम बल फौरवी, आपो अविचल राज ॥ अ०॥१॥जो हुँ जोर्बु मो दिशा। तो न मिले तिलमात । पिण तो चिंतवतां सहूं, वैर पडेसी वात ॥ अ० ॥२॥ जे में कीधी नवनवी, करणी क्रोड प्रकार । तिण हुंति प्रभु छोडवो, तो हुंवे छूटक वार ॥अ०॥३॥ भवसायर विहामणो, जिहां किण वाटने घाट । तुं तारे तोहिज तरू,
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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