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________________ 24 AAVA ७२] . . . . . श्री प्राचीनस्तत्वनावली सनरे । सकल मनोरथ मालिका, तइये सफल करेसनरे ॥धर्म जागरीया जागतां ॥१॥ समरंता गुण प्रामनरे ॥ पांणी वली एहवु रहे, माहरे मन परणामनरे ॥१०॥२॥ अमिअ समाणे बोलडा, बारह परषदा साथनरे ॥ सांभल भवथी ऊभगी, बत लेशु प्रभु हाथनरे ॥ध०॥३॥ जन्म लगे पासे रही, भगत करीस निश दिशनरे॥ तप जप संजम खप करी, मन सुध विसवा बीशनरे ॥ ध०॥४॥ आपण पे जाइ गोचरी, आणीस शुद्ध आहारनरे ॥ साधु सहुने सांचवी, देइस देह आधारनरे ॥ध०॥५॥ चार कर्म चक चूरने, पामीश केवल नाणनरे ॥ श्री जिनराज पसाउले, चढस्ये बोल प्रमाणनरे ॥ध०॥६॥ ढाल ५ पांचमी ॥ धन धन आदर कुवार संजमी ए देशी ॥ तुं गति तुं मति तुं सांचो धणी, तुं बंधव तुं तात । तुज सम अवरन को मुझ वालहो सम
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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