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________________ श्री प्राचीनस्तवनावली ॥ श्री मंडोदा पार्श्वनाथजीका स्तवन । ॥ राग माढ ॥ मंडोदा स्वामी, अंतरजामी, वंदो वारंवार ॥टेक ॥ अश्वसेन कुल चंदलोर, वामादेवीको नंद । वनारसीमें जन्म लियोरे, वरत्या जयजयकार हो ॥ मं० ॥१॥ श्याम वदन तनु शोभतारे, अहि लंछन मनुहार । शत वरसनो आउखोरे, नव हाथ देह प्रमाण हो ॥म०॥२॥ मस्तके मुगट दीपतारे, कानोमें कुंडल सार । वांहे वाजुबंद बेरकारे, गले नवसरयो हार हो ॥मं० ॥३॥ सेंधीयासाही राज्यमेरे, मंडोदा गांवके माय । पार्श्वप्रभुकी प्रतिमा सोहे, आनन्दको नहीं पार हो ॥ मं० ॥४॥ दूर देशथी आयो चलके, दरसण करवा काज । दरसन करके मग्न हुवा में, टालो भवना पाप हो ॥ म०॥५॥ सभा मंडप माही मैने निरख्या, कुशलसूरीन्द गुरुराय । कुशल को
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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