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________________ श्री प्राचीनस्तवनावली . . . . [३ ए गडध्याने, वन्दु सुविहाण । नंदायो रायोसिद्ध, जे जग सहुने जाणे ॥१७॥ नाभिराय कुल वांदसाए, ज्यांछे जिनवर देह । सुभीयाश्रीआदिनाथइन्द्र करे नित सेव ॥१८॥ नलिनी गुल्म विमाण विहाण समाण, राणपुरे वन्दु चौमुखे । नवपलकते चिरक कोड़ जिनवर दे सब सुख ॥ १९ ॥ माडे वाँदु श्रीसुपास-ते वगसीने तारे । बड़नगर इन्दौर वड़ो नगर जुम्हारे॥२०॥ आराधसाए उद्यम सारा, ज्यां छे भवन विहार । नाण तोयतो नामसारा जीवितखामी जुहार ॥२१॥ हवे श्रीशचुंजय आदिश्वरस्वामी, पामुलोढाणे।इहां विमाण वाडमेर जिनवर जोधाणे ॥२२॥ अवरजीके सहु गाम ठाम, ते सहु जीलावे । शिरोही मुख आदमुख, मुख वांदु टमकारे ॥२३॥ इमके तीर्थकर प्रणमुं वन्दु एक चित्त । अजर अमरपद लहे, पामु परम आणंद ॥२४॥
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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