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________________ 2000000000 NAMANN000000000000000000 श्री प्राचीनस्तवनावली . . . . [१४१ २०॥१॥ बाल ब्रह्मचारी गुरु सोभे, महिमा अपरंपारा । यति धर्मसे दीपता गुरुवर, देशना अमृत धारा ॥ मोरे० ॥ २॥ सायर सम गम्भीर गुरुवर, रवीसम तेज प्रतापो । शशी समान है सौम्य सुगुरुवर, मणिसम आप गुरु दीपो ॥ मोरे०॥र० ॥३॥अष्टापद समसुरवीर गुरु, दुर्धर कर्म हठावे। आतम ध्यानमें मगन होय के, मोक्ष नगर कों ध्यावे मोरे०॥ २०॥ ४॥ शहर फलवरधीमें आप विराजो, दर्शन कर हलसाया ॥ दिलमें हर्ष न मावे गुरुवर, आनन्द संघ मोलाया । मोर० ॥२० ॥५॥ वीर चौवीशे एकावन माहें, आश्विन मास सुहाया। कृष्ण बीज सोमवारसु सुन्दर, हर्ष हरख गुण गाया।मोरे० र०॥६॥ ने गुरु सम अवर न दूजा अगमें, चरणमें शीश नमायो, दास प्रेम भक्ती मालीजे, मनवांछित फल पाया मोर ॥२०॥७॥ ॥ गहुँली बीजी ॥ रत्नमुनि गुरु रायके, गुण गाउं चितलाय अक्षर अक्षर के विषे बहु गुण रहे समाय ॥१॥
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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