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________________ १३२ ] श्री प्राचीनस्तवनावली सुर चकनाचूर ॥ दयावती ऊवरे ए, सामा मिल गया के ॥ व्रत० ॥ १६ ॥ तिरीया तिरीया सहु तिर गया ए, हुवा धरमरा दोट ॥ वीजेमलजी इम कहे ए, इणमे न चाले खोट के ॥ व्रत० ॥ १७॥ ॥ जेसलमेर मंडन श्रीचिंतामणि पार्श्वनाथ स्तवन || पार्श्व चिंतामणि भविजन ध्येयं, मन ईप्सित दातारं रे । पत्तन लोद्रव कृतशुभस्थितं, मरु भू नभस्तल चंद्र रे ॥ पार्श्व० ॥ १ ॥ रत्न चिंतामणि सुरतरू तुल्यं, चिंताकदली कृपाणं रे ॥ पार्श्व० ॥२॥ कृतपूर्व पुण्यैर्मया लब्धं, वामा सुतमुदारं रे ॥ पार्श्व० ॥ ३ ॥ चंचच्छ्याम वर्ण प्रभु मुर्त्ति, पार्श्व सेवित शुभ पार्श्व रे ॥ पार्श्व० ॥ ४ ॥ भव्यजन भवजलनिधि तरणे, चारु संस्थित पोतं रे ॥ पा० ॥ ५ ॥ राका पूर्णेदु मुख कमलं, शान्त्यादिकं गुणो पेतं रे ॥ पार्श्व० ॥ ६ ॥ भक्त्या वंदेऽहं जिनपार्श्व, शिवरमणी दातारं रे ॥ पार्श्व० ॥ ७ ॥ सकल गुण गरिष्ठ स्तीर्थकृत् ह्याश्वसेनिः । अमर नर निकायः
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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