SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 146
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ श्री प्राचीनस्तवमावली . . . . [१३१ नहीं ए। मरने दुरगति जाय के ॥व्रत०॥ ८॥ आठ पहोर दिन रातरो ए, नहीं वीरत सुजोग। सदाइ चरतो रहे ए, जाणे जंगलरो ढोर के ॥ व्रत० ॥९॥ जैनधर्म माहे एम कह्यो ए, जाणीये नव वाड ॥ कठण करवो वलीए, दुक्कर दुक्कर थाय के ॥ व्रत०॥ १०॥ उमररा सुख शाश्वता ए॥ न करे अधिक स्नेह । ऊनाले जल विनाए, त्याग दिना छे देह के ॥ व्रत० ॥११॥ भूख तृषारो पीलीयो ए, जीव निकल्यो जाय के पाणी रेणी तणो ए, न घाल्यो मुख रे मांय के० ॥ व्रत०॥ ॥१२॥ चोथो व्रत भांग्या पछी कारी न लागे काय ॥ कदा सामा मिले ए, नहीं काया नहीं माय के ॥ व्रत०॥ १३ ॥ पांच महाव्रत मोटका ए, मुक्ति तणा दातार ॥ पाले सहु भावसे ए, हो जावे खेवा पार के॥ व्रत०॥१४॥ होया होया होसी नही ए, तिण सरिखो जाणो मान ॥ केवलीयो इम कयो ए ऊंडो घणो अथाग ।। व्रत०॥ ॥१५॥ पडिया पडिया सहु पड गया ए, होगया
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy