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________________ १२४ . . . . श्री प्राचीनस्तवनावली वेरे ॥ जी० ॥आरतिकुलटारो संग । जो छोड़ावे समता रति मन लावेरे ॥ जी०॥ आ० ॥६॥ शाता अशाता सम परिणामे, भोगवे ते धन पुरसारे ॥ जी० ॥ समयसुंदर करजोड़ी विनवे, ज्येष्ट सदागुण गावेरे ॥जी॥ आ० ॥ ७ ॥ ॥ सज्झाय ॥ तट यमुनानोरे अति रलियामणोरे ॥ ए देशी॥ नान्हो न मानेरे, कांई का माहरुरे।सो की हसीरे जोय ॥ नगद बेडेरे घणु अटारडीरे ॥ जेठ झूटो मुझ होय ॥१॥ किम जालवीयेरे कुटुम्ब अटारडूरे । करे मुझस्थु नित रोस ॥टेक॥ एकण गामीरे पीहर सासरुरे, बोले मलि मलि दोस । कि० ॥२॥ जेठाणी मुझ परवश थई फिरेरे। देवरने नहीं लाज । देराणी छेरे अति उछाछलीरे, मांडे विरओ काज । कि० ॥३॥ सूसरो सुहालोरे बोली नवी सकेरे, सासुड़ीनो नहीं विश्वास ॥
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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