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________________ श्री प्राचीनस्तवनावली [१.१९ ॥ नमो० ॥ १ ॥ सिद्धाचल अणसण करीरे लो, धरता सिद्धनु ध्यान ॥ मन मोरे | पंचकोड़ी परिवारथीरे लो । पाम्या केवल ज्ञान । मन० ॥ नमो० ॥ २ ॥ चैत्री पूनम मुग्ते गयारे लो, सादी अनंत करो वास ॥ मन० ॥ भव भव सरणो तेहनारे लो । ए मांगु जिनचन्द्र आस ॥ मन० ॥ नमो० ॥ ३ ॥ थुइ १ कल्याण ते श्रेय रूपे, मानियाए, माता बे कुंखे महावीर तो सर्व जिन जननी कुंखेए, आव्या कल्याण तिम धारतो । भाखी जिन पडिमा पूजाए, ऋतुवंती न पूजे देवतो । पूजती ऋतुवंती जे थायए, पूजे न ते प्रभाविक देवतो ॥ १ ॥ (नोट - ए थुई ४ वेला पडिकमणामां पण बोलाय ) थुई ४ कल्याण गर्भ हि वीर हरण ते धारण, त्रिशला कुंखे अवतरीया (संक्रमिया) जी । कल्याण श्रेय
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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