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________________ wwwww ६६] . . . . श्री प्राचीनस्तवनावली ॥३॥ चित्ते भगती वेसी पूरीजे रे, तो अशुभ कर्म चूरीजे रे। शिवपुर नेहत्थो दीजे रे। मानव भव लाहो लीजे रे ॥ मि० ॥ ४॥ तेहिज जिहास लहीजे रे । प्रभुनो सुजस कहिजे रे। जिनराज सखाई कीजे रे ॥ मन वांछित सुख पामीजे रे ॥ मि०॥५॥ ॥ ढाल २१ इकवीशमी ॥ लोक स्वरूप विचारो आतम हित भणी । ए देशी. वीश जिणेसर जग जयवंता जाणीये रे । अढाई द्वीप मझार ॥ धन ते गाम नगर पूर प्रभु विचरता रे, साधु तणो परिवार ॥ वीश० ॥१॥ वासुदेव बलदेव भगति नित सांचवे रे । लहिवा भवजल तीर ॥ चौराशी लक्ष पूर्वनो आउखो रे, गुण गिरुवा गम्भीर ॥ वीश० ॥ २॥ वृषभ लंछन सोभित तनु अवगाहनारे, पणसय धनूष प्रमाण। समवसरण बारह परषदा प्रतिबोधता रे। जगगुरू अमृत वाण ॥ वीश० ॥३॥ धन धन ते जिहा
SR No.032200
Book TitlePrachin Stavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMannalal Mishrilal Chopda
PublisherMannalal Mishrilal Chopda
Publication Year1934
Total Pages160
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size11 MB
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