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________________ [ ९८ । (१३) सांवरो सुखदाई जाकी छवि वरणी न जाई श्री अश्वसेन वामानंदनकी, कीरती त्रिभुवन छाई समेतशिखर गिरि मंडण प्रभुको देख दरस हरखाई - हृदय मेरो अति हुलसाई ॥१॥ आज हमारे सुरतरु प्रगट्यो, आज आनंद बधाई तीन भुवन को नायक निरख्यो, प्रगटी पूर्व पुन्याई ____ सफल मेरो जन्म कहाई ॥२॥ प्रभुके सरस दरस बिन पाये भवभव भटक्यो में भाई अब तेरो चरन शरण चित चाहत, बाल कहे गुण गाई प्रभुजीसे लगन लगाई ॥३॥ । (१४) त्रेवीशमो तीर्थकर माडी वामादेनो लाडलो भवोभव भटकीने आव्यो तारे बारणे भक्त हुँ तारो नाथ तु मारो हुंना छोडु छेडलो झेर भर्या जगमां अटवाणो आशा लईने आव्यो, हवे हुँनो छाड़ छेड़लो, छोडूं नाहवे हुँतो तारो सथवारो तार या ना तार तो ए हुँ ना छोड्ड छेडलो, मनडा मां वसीयो मारा दीलडामां बसीयो रग रगमां व्हाला तु वसोयो हुना छोडूं छेडलो
SR No.032198
Book TitlePrachin Stavan Jyoti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDivya Darshan Prakashan
PublisherDivya Darshan Prakashan
Publication Year
Total Pages166
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size15 MB
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