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________________ ( ६० ) चक्रदत्तः । पानीयभक्त गुटिका | सोऽर्धभागिकस्तुल्या विडंगमरिचाभ्रकाः । भक्तोदकेन संम कुर्याद् गुञ्जासमां गुटीम् ||२७|| भक्तोदकानुपाने का सेव्या वह्निप्रदीपनी । वार्यन्नभोजनं चात्र प्रयोगे सात्म्यमिष्यते ॥ २८ ॥ रससिन्दूर आधा भाग, वायविडंग, काली मिर्च, अभ्रक भस्म प्रत्येक एक एक भाग सब घोटकर चाबलके मांड़में गोली १ रत्तीकी मात्रा से बनाना चाहिये । और चावलके मांड़के ही साथ एक एक गोली प्रातः सायं खाना चाहिये । तथा जल चाव लका भात ही पथ्य लेना चाहिये ॥ २७ ॥ २८ ॥ बृहदग्निमुखचूर्णम् । क्षारौ चित्रक करञ्जलवणानि च । सूक्ष्मैलापत्रकं भांग क्रिमिघ्नं हिंगु पौष्करम् ॥ २९ ॥ शटी दार्वी त्रिवृन्मुस्तं वचा सेन्द्रयवा तथा । धात्रीजीरकवृक्षाम्लं श्रेयसी चोपकुञ्चिका ॥ ३०॥ अम्लवेतसमम्लीका यमानी सुरदारु च । अभयातिविषा श्यामा हबुषारग्वधं समम् ॥ ३१ ॥ तिलमुष्ककशिणां कोकिलाक्षपलाशयोः । क्षाराणि लोहकिट्टे च तप्तं गोमूत्रसेचितम् ॥ ३२॥ समभागानि सर्वाणि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् । मातुलुंगरसेनैव भावयेच्च्, दिनत्रयम् ॥ ६३ ॥ दिनत्रयं च शुक्तेन चार्द्रकस्वरसेन च । अत्यनिकारकं चूर्ण प्रदीप्ताग्निसमप्रभम् ॥ ३४॥ उपयुक्त विधानेन नाशयत्यचिराद्गदान् । अजीर्णकमथो गुल्मान्प्लीहानं गुद्जानि च ॥ ३५ ॥ उदराण्यन्त्रवृद्धिं चाप्यष्ठीलां वातशोणितम् । प्रणुदत्युल्बणान्रोगान्नष्टं वह्निं च दीपयेत् ॥ ३६॥ समस्तव्यञ्जनोपेतं भक्तं दत्त्वा सुभाजने । दापयेदस्य चूर्णस्य बिडालपदमात्रकम् ॥ ३७ ॥ गोदोहमात्रात्तत्सर्व द्रवीभवति सोष्मकम् । यवाखार, सस्तीखार, चीतकी जड़, पाढ़, कञ्जा, पांचों छोटी इलायची, तेजपात, भारङ्गी, वायविडंग, भुनी नमक, हींग, पोहकरमूल, कचूर, दारूहल्दी, निसोथ, नागरमोथा, मीठा वच, इन्द्रयव, आमला, सफेद जीरा, कोकम अथवा जम्बीरी नीम्बू, गजपीपल, कलौंजी, आम्लवेत, इमली, अजवाइन, १ यहांपर कुछ लोग “रस" शब्दसे शुद्ध पारद ही लेते हैं और अकेले पारदका प्रयोग न होनेके कारण समान भाग कभी मिला जी कर छोड़ते हैं ॥ [ अग्निमांद्या देवदारु, बड़ी हर्रका छिल्का, अतीस, काला निसोथ, हाऊवेर, | अमलतासका गूदा - सब समान भाग तथा तिल, मोखा, सहिजन, तालमखाना तथा ढाक सबके क्षार तथा तपा तपा कर गोमूत्रमें बुझाया हुआ मण्डूर, सब समान भाग लेकर महीन चूर्ण करना चाहिये । फिर बिजौरे निम्बू के रससे ही तीन दिन भावना देनी चाहिये । फिर तीन दिन, सिरकेसे तथा ३ दिन अदरख के रससे भावना देनी चाहिये । यह चूर्ण अग्निको अत्यन्त दीप्त करता तथा नियमसे सेवन करनेसे शीघ्र ही अजीर्ण, गुल्म, प्लीहा, अर्श, उदररोग, अन्त्रवृद्धि, अष्टीला, वातरक्तको नष्ट करता तथा मन्द अग्निको दीप्त करता है । हरतरहके भोजन बनाकर थाली में रखिये और यह चूर्ण १ तोला उसीमें मिला दीजिये, तो जितनी देरमें गाय दुही जाती है, उतनी ही देर में सब अन्न गरम होकर पिघल जायगा ॥ २९-३७ ॥ भास्करलवणम् । पिप्पलीपिप्पलीमूलं धान्यकं कृष्णजीरकम् ॥३८॥ सैन्धवं च बिडं चैव पत्रं तालीशकेशरम् । एषां द्विपलिकाभागान्पञ्च सौवर्चलस्य च ॥३९॥ मरिचाजाजिशुण्ठीनामेकैकस्य पलं पलम् । गेले चार्धभागे च सामुद्रात्कुडवद्वयम् ॥ ४० ॥ दाडिमात्कुडवं चैव द्वे चाम्लवेतसात् । एतच्चूर्णीकृतं लक्ष्णं गन्धाढ्यममृतोपमम् ॥ ४१ ॥ लवणं भास्करं नाम भास्करेण विनिर्मितम् । जगतस्तु हितार्थाय वातश्लेष्मामयापहम् ॥ ४२ ॥ वातगुल्मं निहन्त्येतद्वातशूलानि यानि च । तक्रमस्तुसुरासीधुशुक्तकाजिकयोजितम् ॥ ४३ ॥ जांगलानां तु मांसेन रसेषु विविधेषु च । मन्दाग्नेरश्नतः शक्तो भवेदावेव पावकः ॥ ४४ ॥ अर्शासि ग्रहणीदोषकुष्ठामयभगन्दरान् । हृद्रोगमा मदोषांश्च विविधानुदर स्थितान् ॥ ४५ ॥ प्लीहानमश्मरी चैव श्वासकासोदरक्रिमीन् ॥४५॥ विशेषतः शर्करादीन्रोगान्नानाविधांस्तथा ॥ ४६ ॥ पाण्डुरोगांश्च विविधान्नाशयत्यशनिर्यथा । छोटी पीपल, पिपरामूल, धनियां, काला जीरा, सेंधानमक, विड़नमक, तेजपात्र, तालीशपत्र, नागकेशर प्रत्येक ८ तोला, काला नमक २० तोला, काली मिर्च, सफेद जीरा, सोंठ प्रत्येक ४ तोला, दालचीनी, छोटी इलायची प्रत्येक २ दो तोला, सामुद्र नमक ३२ तोला, अनारदाना १६ तोला, अम्लवेत ८ तोला - सबको कूटकर कपड़छान चूर्ण करना चाहिये । यह ' भास्करलवण ' भगवान् भास्करने संसारके कल्याणार्थ बनाया
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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