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________________ (३८) [ ग्रहण्य - होता है, तत्कालका बनाया हुआ मट्ठा विशेष जलन | श्रीफलपुटपाकः। नहीं करता ॥४॥५॥ जम्बूदाडिमश्रृंगाटपाठाकञ्चटपल्लवैः । शुण्ठ्यादिकाथः। पकं पर्युषितं बालबिल्वं सगुडनागरम् ॥१२॥ शुण्ठी समुस्तातिविषां गुडूची हन्ति सर्वानतीसारान्ग्रहणीमतिदुस्तराम् । पिबेजलेन कथितां समांशाम् । जामुन, अनार, सिंघाड़ा, पाढ, चौलाईके पत्तोंको लपेट मन्दानलत्वे सततामताया डोरेसे या कुशसे बांधकर अङ्गारोंमें भुना गया कच्चा बेल, मामानुबन्धे ग्रहणीगदे च ॥६॥ पर्युषित (बासी) समान भाग गुड़ तथा जितनेमें कटु हो जाय, सोंठ, नागरमोथा, अतीस, गुर्च सब चीजें समान उतनी सोंठ मिलाकर खानेसे समस्त अतिसार तथा ग्रहणी नष्ट भाग ले क्वाथ बनाकर मन्दाग्नि, आमदोष तथा ग्रहणीमें होती है ॥ १२॥ पीना चाहिये ॥६॥ नागरादिकाथः। धान्यकादिक्वाथः। नागरातिविषामुस्तकाथः स्यादामपाचनः ॥ १३ ॥ धान्यकातिविषोदीच्ययमानीमुस्तनागरम् । चूर्ण हिंग्वष्टकं वातग्रहण्यां तु घृतानि च । बलाद्विपर्णीबिल्वं च दद्यादीपनपाचनम् ॥७॥ सोंठ, अतीस, नागरमोथाका क्वाथ आमका पाचन करता धनियां, अतीस, सुगन्धवाला, अजवाइन, नागरमोथा, है । “हिंग्वष्टक" चूर्ण घीके साथ सेवन करनेसे वातग्रहणीको सोंठ, खरेटी, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, तथा बेलका गूदा अग्निको नष्ट करता है, तथा आगे लिखे धृत वातज ग्रहणीको शान्त दीप्त तथा आमका पाचन करता है ॥ ७ ॥ करते हैं ॥ १३ ॥ चित्रकादिगुटिका। नागरादिचूर्णम् । चित्रकं पिप्पलीमूलं द्वौ क्षारी लवणानि च । । नागरातिविषामुस्तं धातकी सरसाजनम् ॥ १४॥ व्योषहिंग्वजमोदा च चव्यं चैकत्र चूर्णयेत् ॥ ८॥ वत्सकत्वक्फलं बिल्वं पाठां कटुकरोहिणीम् ।। गुटिका मातुलंगस्य दाडिमाम्लरसेन वा। पिबेत्समांशं तच्चूर्ण सक्षौद्रं तण्डुलाम्बुना ॥१५।। कृता विपाचयत्यामं दीपयत्याशु चानलम् ॥ ९॥ पैत्तिके ग्रहणीदोषे रक्तं यश्चोपवेश्यते । चीतकी जड़, पिपरामूल, यवाखार, सज्जीखार, पांचों अस्यिथ गुदे शूलं जयेच्चैव प्रवाहिकाम् ॥१६॥ नमक, सोंठ, मिर्च, पीपल, भुनी हींग, अजवाइन, | __नागराद्यमिदं चूर्ण कृष्णात्रेयेण पूजितम् । और चव्य-सबको समान भागले कूट छान बिजौरे निम्बूके रस | शीतकषायमानेन तण्डुलोदककल्पना ॥ १७ ॥ अथवा खट्टे अनारके रससे गोली बना लेनी चाहिये । यह आमका केऽप्यष्टगुणतोयेन प्राहुस्तण्डुलभावनाम् । पाचन तथा अग्निको दीप्त करती है ॥८॥९॥ सोंठ, अतीस, नागरमोथा, धायके फूल, रसौत, कुड़ेकी पञ्चलवणगणना। छाल, इन्द्रयव, बेलका गूदा, पाढ़, कुटकी-समान भाग ले चूर्ण सौवर्चलं सैन्धवं च बिडमौद्धिदमेव च । बनाकर शहद तथा चावलके पानीके साथ सेवन करनेसे पैत्तिक ग्रहणी, रक्तके दस्त, रक्ताश, गुदाका शूल व प्रवाहिका रोग सामुद्रेण समं पञ्च लवणान्यत्र योजयेत् ॥१०॥ नष्ट होते हैं । शीतकषायकी विधि अर्थात् षड्गुण जलमें काला नमक, सेंधा नमक, विड़ नमक, खारी था साम्भर रक्खा गया छाना गया अथवा किसीके सिद्धान्तसे नमक, सामुद्र नमक-यह “पांच लवण" कहे जाते हैं ॥१०॥ अष्टगुणजलमें रखकर छाना गया " तण्डुलोदक" कहा जाता श्रीफलकल्कः। है॥ १४-१७ ॥श्रीफलशलाटुकल्को नागरचूर्णेन मिश्रितः सगुडः ।। भूनिम्बाद्यं चूर्णम् । ग्रहणीगदमत्युग्रं तक्रभुजा शीलितो जयति ॥ ११॥ - कच्चे बेलके गूदाका कल्क सोंठके चूर्ण तथा गुड़के साथ सेवन भूनिम्बकटुकाव्योषमुस्तकेन्द्रयवान्समान् ॥१८॥ करनेसे तथा मठेके पथ्यसे कठिन ग्रहणीरोग नष्ट हो द्वी चित्रकाद्वत्सकत्वग्भागान्षोडश चूर्णयेत् । जाता है ॥११॥ गुडशीताम्बुना पीतं ग्रहणीदोषगुल्मनुत् ॥ १९ ॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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