SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 37
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ (१०) चक्रदत्त [ ज्वरा निम्बूके रस अथवा काजीमें पीसकर ढाकके पत्तोंका अथवा। पीपल छोटी, पिपरामूल, चव्य, चौतेकी जड, सोंठ, बेरकी पत्ती अथवा नीमकी पत्तीके फेनका लेप करना चाहिये९३ | काली मिच, इलायची बड़ी, अजमोद, इन्द्रयव, पाढ़ी, सम्भा कालेयचन्दनानन्तायष्टीबदरकाजिकैः। लुके बीज, सफेद जीरा, भारङ्गी, बकायनके फल, हींग, कुटकी, सघृतैःस्याच्छिरोलेपस्तृष्णादाहार्तिशान्तये ॥९४॥ सरसों, बायबिडंग, अतीस, मूर्वा यह 'पिप्पल्यादि गण ' कहा पीला चन्दन,, सफेद चन्दन, यवासा, मोरेठी, बेरको जाता है । यह कफ, जुखाम, अरुचि तथा वायुको नष्ट करता, पत्ती सबको महीन पीस घी तथा काजी मिलाकर प्यास, दाह अग्निको दीप्त करता तथा गुल्म व शुलको नष्ट करता और तथा बेचैनीकी शान्तिके लिये शिरमें लेप करना चाहिये ॥९४॥ आमका पाचन करता है ॥ ९८-१००॥ जलधारा। कटुकादिवाया। उत्तानसुप्तस्य गभीरताम्र कटुकं चित्रकं निम्बं हरिद्रातिविषे वचाम् । कांस्यादि पात्रं प्रणिधाय नाभी। कुष्ठमिन्द्रयवं मूर्वी पटोलं चापि साधितम्।।१०१।। तत्राम्बुधारा बहुला पतन्ती पिबेन्मरिचसंयुक्तं सक्षौद्रं श्लैष्मिके ज्वरे । निहन्ति दाहं त्वरितं सुशीता ।। ९५ ॥ कुटकी, चीतकी जड़, नीमकी छाल, हलदी, अतीस, रोगीको उत्तान सुलाकर उसकी नाभीपर गहरा ताम्रपात्र रख वच दूधिया, कूठ, इंद्रजव, मूर्वा, पखलके पत्ते इनका क्वाथ उसमें ठण्ढे जलकी धारा अधिक समय तक छोड़नेसे तत्काल बनाकर काली मिच तथा शहद मिलाकर कफज्वरमें देना दाहको शान्त कर देती है ॥९५॥ चाहिये ॥१०१॥पीतकाजिकवस्त्रावगुण्ठनं दाहनाशनम् । निम्बादिक्वाथः। कपड़ेको चौपरत कर काजीमें भिगोकर शिर, हृदय तथा पेटपर रखनेसे दाह शान्त होता है। निम्बविश्वामृतादारु शटी भूनिम्बपौष्करम् ॥१०२ .. जिह्वातालुगलक्लोमशोषे मूर्ध्नि तु दापयेत् ।। पिप्पल्यौ बृहती चेति क्वाथो हन्ति कफज्वरम् । नामकी छाल, सोंठ, गुर्च, देवदारु, कपूरकचरी, चिरायता, केशरं मातुलुङ्गस्य मधुसैन्धवसंयुतम् ॥९६ ॥ पोहकरमूल, छोटी पीपल, बड़ी पीपल, बड़ी कटेरी इन जिह्वा, तालु, गला तथा क्लोम (पिपासास्थान) के सखने "समस्त औषधियोंका बनाया काथ कफज्वरको नष्ट पर मस्तकम बिजोरे निम्बूका केशर, शहद तथा संधानमक | करताना मिलाकर रखना चाहिये ॥ ९६ ॥ सिन्दुवारवाथः। कफज्वरचिकित्सा । सिन्दुवारदलक्वाथः सोषणः कफजे ज्वरे ॥१०३॥ मातुलुङ्गशिफाविश्वब्राह्मीग्रन्थिकसंभवम् । । अंघयोश्च बले क्षीणे कर्णे वा पिहिते पिबेत्।। कफज्वरेऽम्बु सक्षारं पाचनं वा कणादिकम् ॥१७॥ सम्भालूके पत्तोंका काढ़ा काली मिर्च मिलाकर देनेसे बिजोरे निम्बूकी जड़, सोंठ, ब्राह्मी, पिपरामूल सब समान | सब समान कफज्वर, कानोंकी अवरुद्धता तथा जंघाओंकी निर्बलताको भाग ले क्वाथ बना जवाखार मिलाकर पिलानेसे कफज्वरका । का दूर करता है ॥ १०३॥पाचन होता है। अथवा पिप्पल्यादि क्वाथ यवक्षार मिलाकर पिलाना चाहिये ॥ ९ ॥ आमलक्यादिक्वाथः। पिप्पल्यादिक्वाथः। आमलक्यभया कृष्णा चित्रकश्चेत्ययं गणः॥ सर्वज्वरकफातङ्कभेदी दीपनपाचनः ॥ १०४ ॥ पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकनागरम् । आँवलेको छिलका, बडी हर्रका छिलका, छोटी मरिचैलाजमोदेन्दुपाठारेणुकजीरकम् ॥९८॥ पीपल. चीतकी जड़ यह " आमलक्यादि गण" समस्त ज्वर भाङ्गी महानिम्बफलं रोहिगी हिगु सर्वपम् । तथा कफके रोगोंको नष्ट करता है, दस्त साफ लाता है, अग्निको विडङ्गातिविष मूर्वा चेत्ययं कीर्तितो गणः ॥ ९९॥ दीप्त तथा आमका पाचन करता है ॥ १०४ ॥ पिप्पल्यादिः कफहरः प्रतिश्यारोचकानिलान् । । निहन्यादीपनोगुल्मशूलघ्नस्त्वामपाचनः॥१०० ।। - त्रिफलादिक्वाथः। त्रिफलापटोलवासाछिन्नरुहातिक्तरोहिणीषड्मन्थाः। १ जल शरीरमें न पड़ने पावे, इसका ध्यान रहे। । मधुना श्लेष्मसमुत्थे दशमूलीवासकस्य वा काथः॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy