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________________ विकारः भाषाटीकोपेतः। (२८) पञ्चवल्कलके क्वाथसे सिद्ध स्नेहमें भिगे हुए फोहेके धारण| बचा, नीलोफर, कूठ, काली मिर्च, असगन्ध और करनेसे विप्लुता नष्ट होती है । कर्णिनीमें कूठ, छोटी | हल्दीका लेप योनिको संकुचित करता है । तथा मैनफल, शहद, पीपल, आकके अंकुर व सेंधानमककी बकरेके मूत्रमें बत्ती| व कपूरसे पूर्ण वृद्धा स्त्रीकी भी योनि बहुत कड़ी और चिकनी बनाकर धारण करना चाहिये । तथा समस्त कफनाशक | होती है ॥ १९-२१॥ उपाय करना चाहिये । उदावर्त और वायुरोगोंमें घृत, .. योनिगन्धनाशकं घृतम् । तेल व वसाका प्रयोग तथा स्वेदन करना चाहिये । और यही विधि महायोनि और स्रस्त योनिमें भी करनी| पञ्चपल्लवयष्टयाह्वम चाहिये ॥ १०-१४॥ रविपक्कमन्यथा वा योनिगन्धातिनाशनम् ॥२२॥ पञ्चपल्लव, मौरेठी व चमेलीके फूलके कल्कसे सूर्य की किरणों में आखुतैलम् । तपाया अथवा चतुर्गुण जल मिलाकर पकाया घृत योनिगन्धको आखोर्मासं सपदि बहुधा खण्डखण्डीकृतं यत् नष्ट करता है ॥ २२ ॥ तैले पाच्यं द्रवति नियतं यावदेतन्न सम्यक् । तत्तलाक्त वसनमनिशं योनिभागे दधाना कुसुमसञ्जननी वर्तिः। हन्ति व्रीडाकरभगफलं नात्र सन्देहबुद्धिः ।। १५॥ इक्ष्वाकुबीजदन्तीचपलागुडमदनकिण्वयष्टथाहः। मूसेके मांसके छोटे छोटे टुकड़े चतुर्गुण तैल ( तथा| ... सस्नुकक्ष सस्नुक्षीरवर्तिोनिगता कुसुमसजननी ॥२३॥ तैलसे चतुर्गुण जल ) मिलाकर पकाना चाहिये । जब यह । कडुई तोंबीके बीज, दन्ती, छोटी पीपल, गुड़, मैनफल, सिद्ध हो जाय, तब उतार कर छान उस तैलसे भिगोया किण्व (शराबकी किट) और मौरेठीक चूर्णको थूहरके दूध में हुमा कपड़ा योनिमें रखनेसे योनिकन्द नष्ट होता है, इसमें सन्देह मिलाकर बनायी गयी बत्ती योनिमें रखनेसे मासिक धर्मको न करना चाहिये ॥ १५ ॥ उत्पन्न करती है ॥ २३ ॥ भिन्नादिचिकित्सा। प्राशः। शतपुष्पातललेपाद्वदरीदलजात्तथा। सकाजिकं जवापुष्पं भृष्टं ज्योतिष्मतीदलम् । पेटिकामूललेपाच्च योनिभिन्ना प्रशाम्यति ॥ १६ ॥ सम्प्राश्य न चिरादेव वनिता त्वार्तवं लभेत् ॥२४॥ सुषवीमूललेपेन प्रविष्टान्तर्बहिर्भवत् । काजीके साथ जवापुष्प और भूने मालकांगनीके पत्ते पीसकर योनिर्मूषरसाभ्यङ्गानिःसृता प्रविशेदपि ॥ १७॥ | चाटनेसे शीघ्रही मासिक धर्म होता है ॥ २४ ॥ लोध्रतुम्बीफलालेपो योनिदाढर्थ करोति च। दूर्वापाशः। वेतसमूलनिष्क्वाथक्षालनेन तथैव च ॥१८॥ सरक्तप्रदरा वापि ससकस्रावा च गर्भिणी । मूषिकावागुलिवसाम्रङ्क्षणं योनिदाढर्यदम् । दूर्वायाः पिष्टकम्प्राश्य नामृक्स्रावेण पीडयते २५॥ सौंफके तैलके लेप तथा बेरीकी पत्तीके लेप अथवा पेटिका दूधकी चटनी बनाकर चाटनेसे रक्तस्राव बन्द होता है॥२५॥ (पाढल) की जड़के लेपसे भिन्न योनि शान्त होती है । रजोनाशकयोगौ। और काले जीरेकी जड़के लेपसे अन्तःप्रविष्ट योनि बाहर निकलेती है । तथा मूसेके मांस रसकी मालिशसे बाहर निकली धाव्यञ्जनाभयाचूर्ण तोयपीतं रजो हरेत् । प्रविष्ट हो जाती है । लोध और तोम्बीके फलका लेप योनिको | शेलुच्छदमिश्रपिष्टं भक्षणं च तदर्थकृत् ॥ २५॥ दृढ़ करता है। बेतकी जड़के काढ़ेसे धोनेसे भी यही गुण (१) आँवला, सुरमा और हरोंका चूर्ण कर जलके साथ पीनेसे होता है । और मूसा तथा बगुलेकी वसाकी मालिश योनिको मासिकधर्म नहीं होता । (२) तथा लसोड़ेके पत्तोंको पीसकर दृढ करती है ॥ १६-१८॥ खाना भी यही गुण करता है ॥ २५॥ योनिसंकोचनम् । गर्भप्रदा योगाः। बचा नीलोत्पलं कुष्ठं मरिचानि तथैव च ॥ १९॥ पुष्योद्धृतं लक्ष्मणायाश्चक्राङ्गायास्तु कन्यया । अश्वगन्धा हरिद्रा च गाढीकरणमुत्तमम् ॥२०॥ पिष्टं मूलं दुग्धघृतमृती पतिं तु पुत्रदम् ॥२६ ।। . मदनफलमधुककर्पूरपारतं भवति कामिनीजनस्य ।। काथेन हयगन्धायाः साधितं सघृतं पयः । । विगलितयौवनस्य च वराङ्गमतिगाढं सुकुमारम्।२१. ऋतुलाताङ्गना पीत्वा गर्भ धत्ते न संशयः ॥२७ ।। ३६
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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