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________________ (२६०) [नेत्ररोगाभन्न्न्न्न्न्न्न पयसालोडितश्चाक्ष्णोः पूरणाच्छोथशूलनुत् । वासादिकाय! अभिष्यन्देऽधिमन्थे च स्रावे रक्ते च शस्यते ॥३९॥ बेलकी पत्तीके रसमें सेंधानमक और घी मिलाकर ताम्रके आटरूषाभयानिम्बधात्रीमुस्ताक्षकूलकैः। बर्तनमें कौड़ियोंके साथ घिस गायके गोबरकी आंचसे गरमकर| रक्तस्रावं कर्फ हन्ति चक्षुष्यं वासकादिकम् ॥४६ ।। दूध मिला आंखोंमें छोड़नेसे सूजन, शूल, अभिष्यन्द, अधिमन्थ, अडूसा, हर्र, नीमकी छाल, आंवला, नागरमोथा, बहेड़ा, स्राव और रक्तदोष शांत होते हैं ॥ ३८ ॥ ३९॥ परवलका क्वाथ रक्तस्राव व कफको नष्ट करता तथा नेत्रोंके लिये हितकर है ॥ ४६॥ लवणादिसिञ्चनम् । सलवणकटुतैलं काजिकं कांस्यपात्रे बृहदासादिः। वासां घनं निम्बपटोलपत्रं घनितमुपलधृष्टं धूपितं गोमयानी। तिक्तामृताचन्दनवत्सकत्वक् । सपवनकफकोपं छागदुग्धावसिक्त जयति नयनशुलं स्रावशोथं सरागम् ॥४०॥ कलिङ्गदाऊदहनं च शुण्ठीनमक और कडए तैलके साथ काजीको कासेके पात्रमें भूनिम्बधाच्यावभयाविभीतम् ।। ४७ ॥ गाढाकर पत्थरसे घिस गोबरके कंड़ोंसे गरमकर बकरीके दूधमें श्यामायवकाथमथाष्टभागं मिलाकर आंखमें छोड़नेसे वात व कफके कोप, नेत्रशूल, स्राव, पिबेदिमं पूर्वदिने कषायम् । शोथ तथा लालिमा दूर होते हैं ॥ ४०॥ तैमिर्यकण्डूपटलाव॒दं च शुक्र निहन्याद् व्रणमत्रणं च ॥४८॥ अन्ये उपायाः। तरुस्थविद्धामलकरसः सर्वाक्षिरोगनुत् । पीलुं च काचं च महारजश्च नक्तान्ध्यरागं श्वयधुं सशुलम् । पुराणं सर्वथा सार्पः सर्वनेत्रामयापहम् ॥४१॥ निहन्ति सर्वान्नयनामयांश्व अयमेव विधिः सर्वो मन्थादिष्वपि शस्यते । । वासादिरेष प्रथितप्रभावः ॥ ४९ ॥ अशान्ती सर्वथा मन्थे भ्रुवोरुपरि दाहयेत्॥५२/ पेड़से तोड़े ताजे आंवलेका रस समस्त नेत्ररोगोंको नष्ट करता अडूसा, नागरमोथा, नीम की पत्ती, परवलकी पत्ती, कुटकी, है। तथा पुराना घी समस्त नेत्ररोगोंको नष्ट करता है। यही सब | गुर्च, चन्दन, कुड़ेकी छाल, इन्द्रयव, दारुहल्दी चीता, सौंठ, विधि मन्थादिमें करनी चाहिये, यदि मन्थ शांत न हो तो भॊके | चिरायता, आंवला, बड़ी हरे, बहेड़ा, निसोथ व यवका अष्टमांश ऊपर दागना चाहिये ॥४१॥४२॥ शेष क्वाथ प्रातःकाल पीना चाहिये । यह तिमिररोग, खुजली, पटल, अर्बुद, सत्रण, अत्रण, शुक्र, पीलु, काच, धूलिपूर्णता, नेत्रपाकचिकित्सा। रतौन्धी, लालिमा, सूजन, शूल, यहांतक कि समस्त नेत्ररोगोंको जलौकापातनं शस्तं नेत्रपाके विरेचनम् । | नष्ट करता है । यह “वासादि" प्रसिद्ध प्रभाववाला है४७-४९॥ शिराव्यधं वा कुर्वीत सेका लेपाश्च शुक्रवत् ॥४३॥। त्रिफलाकाथः। . नेत्रपाकमें जोक लगाना, विरेचन, शिराव्यध करना चाहिये पथ्यास्तिस्रो विभीतक्यः षड् धाच्यो द्वादशैव तु । तथा शुक्र के समान लेप व सेक करना चाहिये ॥४३॥ प्रस्थाघे सलिले क्वाथमष्टभागावशेषितम् ॥५०॥ विभीतकादिवाथः। पीत्वाभिष्यन्दमानावं रागश्च तिमिरं जयेत् ॥५१॥ संरम्भरागशूलाश्रुनाशनं हकप्रसादनम् । विभीतकशिवाधात्रीपटोलारिष्टवासकैः। हरे ३, बहेड़े ६, आंवले १२, जल ६४ तो० में पकाना काथो गुग्गुलुना पेयः शोथशुलाक्षिपाकहा ॥४४॥ चाहिये । ८ तोला बाकी रहनेपर उतार मल छानकर पीनेसे पुष्पं च सत्रणं शुक्रं रागादींश्चापि नाशयेत् । अभिष्यन्द, आस्राव, लालिमा व तिमिरको नष्ट करता है तथा एतैश्चापि घृतं पकं रोगांस्तांश्च व्यपोहति ॥४५॥ शोथ शूल आदिको नष्ट कर दृष्टिको स्वच्छ करता है॥५०॥५१॥बहेड़ा, हर्र, आंवला, परवल, नीमकी छाल व अडूसाके | क्वाथमें गुग्गुलु मिलाकर पीनेसे सूजन तथा दर्द तथा नेत्रपाक, आगन्तुज चिकित्सा। फूली, व्रणयुक्त सूजन लालिमा आदि नष्ट होती है। तथा इन्हींसे नेत्रे त्वभिहते कुर्याच्छीतमाश्च्योतनादिकम् ५२. पकाया घी भी उन रोगोंको नष्ट करता है ॥ ४४ ॥४५॥ | दृष्टिप्रसादजननं विधिमाशु कुर्यात्
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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