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________________ धिकारः] भाषाटीकोपेतः। (२१५) तण्डुललेपाः। ___ जो मनुष्य शुद्ध गन्धकका चूर्ण २ तोला कडुये तैलमें नारिकेलोदके न्यस्तास्तण्डुलाः प्रतितां गताः। मिला सूर्यकी किरणोंमें तपाकर ३ दिनतक पीता है और लेपाद्विपादिकां नन्ति चिरकालानुबन्धिनीम्॥४१॥ स्नान कर दूधका पथ्य लेता है, उसका शरीर कनकके नारियलके जलमें रक्खे चावल सड़ जानेपर लेप करनेसे ससमान देदीप्यमान कामयुक्त होता है । (यह मात्रा १ दिनकी विपादिकाको नष्ट करते हैं ॥४१॥ न समझना चाहिये किन्तु ३ दिनमें इतना कई बारमें खिलाना चाहिये)॥४७॥ पादस्फुटननाशको लेपः। उद्वर्तनम् । सर्जरसः सिन्धूद्भवगुडमधुमहिषाक्षगैरिकं सघृतम् ।। निशासुधारग्वधकाकमाचीसिक्थकमेतत्पदं पादस्फुटनापहं सिद्धम् ॥४२॥ __ पत्रैः सदाप्रिपुणाडबीजैः । राल, सेंधानमक, गुड़, शहद, गुग्गुल, गेरू, घी तथा मोमको मिला पकाकर लेप करनेसे पैरोंका फटना शान्त | तक्रेण पिष्टैः कटुतेलभित्रैः होता है ॥ ४२॥ पामादिषूद्वर्तनमेतदिष्टम् ॥४८॥ कच्छूहरलेपौ। हल्दी, सेहुण्ड, अमलतास तथा मकोयके पत्ते और दारुहल्दी व पवांड़के बीज सबको मठेमें पीस कडुआ तैल मिलाकर उब. अवल्गुजं कासमर्द चक्रमर्द निशायुतम् । टन लगाना पामादिमें हितकर है ॥४८॥ माणिमन्थेन तुल्यांशं मस्तुकांजिकपेषितम् ।। कच्छू कण्डूं जयत्युमां सिद्ध एष प्रयोगराट्॥४३॥ सिन्दूरयोगः। कोमलं सिंहास्यदलं सनिशं सुरभिजलेन संपिष्टम्।। सिन्दूरमरिचचूर्ण महिषीनवनीतसंयुतं बहुशः । दिवसत्रयेण नियत क्षपयति कच्छू विलेपनतः ४४] लेपानिहन्ति पामां तैलं करवीरसिद्धं वा ॥४९ ।। (१) बकुची, कसौंदी, चकवड़, हल्दी तथा सेंधानमक समान| सिंदूर. व काली मिर्चका चूर्ण भैसीके मक्खनमें मिलाकर भाग ले दहीके तोड़ व काजीमें पीसकर लेप करनेसे उग्र किच्छू अनेक बार लेप करनेसे तथा कनैरसे सिद्ध तैल लगानेसे पामा व कण्डू नष्ट होती है । अथवा (२) कोमलवासाके पत्ते और नष्ट होती है ॥४९॥ हल्दीको गोमूत्रमें पीसकर लेप करनेसे निःसन्देह ३ दिनमें कच्छ नष्ट होती है ॥४३॥ ४४ ॥ कुष्ठहरो गणः। - मांसी चन्दनसम्पाककरजारिष्टसर्षपम् । पानम्। शटीकुटजदाय॑ब्दं हन्ति कुष्ठमयं गणः ॥५०॥ हरिद्राकल्कसंयुक्तं गोमूत्रस्य पलद्वयम् । जटामांसी, चन्दन, अमलतास, कजा, नीम, सरसों, कचूर पिबेन्नरः कामचारी कच्छूपामाविनाशनम् ॥४५॥ कुटज, दारुहल्दी और नागरमोथा यह गण, कुष्ठको नष्ट हल्दीके कल्कके साथ गोमूत्र २ पल पीनेसे यथेष्ट करता है ॥५०॥ आहार विहार करनेपर भी कच्छू व पामा नष्ट होती है ॥४५॥ __भल्लातिकादिलेपः। पथ्यायोगः। भल्लातकद्वीपिसुधाकमूलं शोथपाण्ड्वामयहरी गुल्ममेहकफापहा । गुजाफलं त्र्यूषणशङ्खचूर्णम् । कच्छूपामाहरी चैव पथ्या गोमूत्रसाधिता ॥ ४६॥ तुत्थं सकुष्ठं लवणानि पञ्च गोमूत्र में पकायी गयी छोटी हरोंके सेवन करनेसे सूजन, क्षारद्वयं लाङ्गलिकां च पक्त्वा ॥५१॥ पाण्डुरोग, गुल्म, प्रमेह, कफ, कच्छू, और पामा नष्ट स्नुह्यर्कदुग्धे धनमायसस्थं होती है ॥४६॥ शलाकया तं विदधीत लेपम् । गन्धकयोगः। कुष्ठे किलासे तिलकालके च पिबति सकटुतैलं गन्धपाषाणचूर्ण अशेषदुर्नामसु चर्मकीले ॥५२॥ । रविकिरणसुतप्तं पामलो यः पलार्धम्। भिलावां, चीता, सेहुण्ड व आककी जड़, गुजाफल, त्रिकटु, त्रिदिनतदनुसिक्तः क्षीरभोजी च शीघ्रं । | शंख, तूतियां, कूठ, पांचों नमक. यवाखार, सज्जीखार, कालभवति कनकदीप्त्या कामयुक्तो मनुष्यः॥४७॥ हारी इनको सेहुंड व आकक दूधके साथ लोहेके पात्रमें पाक कर
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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