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________________ (१८४) चक्रदत्तः। (शोथा - nerwwwsagrorror-r rrieremoriww ererrerioner अभया दारु मधुकं तिक्ता दन्ती सपिप्पली। पुनर्नवाष्टकः काथः। पटोल चन्दनं दावी त्रायमाणेन्द्रवारुणी ॥३॥ पुनर्नवानिम्बपटोलशुण्ठी एषां काथः ससर्पिष्कः श्वयथुज्वरदाहहा। तिक्तामृतादार्वभयाकषायः। विसर्पतृष्णासन्तापसन्निपातविषापहा । सर्वाङ्गशोथोदरकासशूलशीतर्वीयर्हिमजलरभ्यङ्गादींश्च कारयेत् ॥४॥ श्वासान्वितं पाण्डुगदं निहन्ति ॥८॥ पित्त प्रधान शोथमें दूध पीता हुआ निसोथ, गुर्च और पुनर्नवा, नीमकी छाल, परवलकी पत्ती, सोंठ, कुटकी, त्रिफलाका क्वाथ पीवे। अथवा १ तोला त्रिफलाका चूर्ण गोमूत्रमें गुर्च, देवदारु तथा बड़ी हर्रका छिल्का इनका क्वाथ सर्वाङ्गशोथ, मिलाकर पीवे । इसी प्रकार बड़ी हर्रका छिल्का, देवदारु, उदर, कास, शूल और श्वासयुक्त पाण्डुरोगको नष्ट करता है ॥८॥ मोरेठी, कुटकी, दन्ती, छोटी पीपल, परवलकी पत्ती, चन्दन, विविधा योगाः। दारुहल्दी, त्रायमाण, व इन्द्रायणके क्वाथमें घी मिलाकर पीनेसे सूजन, ज्वर, दाह, विसर्प, तृष्णा, जलन, सन्निपात और विष आर्द्रकस्य रसः पीतः पुराणगुड मश्रितः । दोष नष्ट होते हैं । तथा शीत वीर्य स्नेह तथा ठण्ढ़े जलसे | अजाक्षीराशिनां शीघ्रं सर्वशोथहरो भवेत् ॥ ९॥ मालिश सिञ्चन व अवगाहनादि कराना चाहिये ॥२-४ ॥ पुनर्नवादारुशुण्ठीकाथे मूत्रे च केवले । कफजशोथचिकित्सा। दशमूलरसे वापि गुग्गुलुः शोथनाशनः ॥१०॥ पुनर्नवाविश्वत्रिवृद्गुडूची बिल्वपत्ररसं पूतं शोषणं श्वयथौ विजे । सम्पाकपथ्यामरदारुकल्कम् । विट्सङ्गे चैव दुर्नानि विदध्यात् कामलास्वपि।११ शोथे कफोत्थे महिषाक्षयुक्त गुडपिप्पलिशुण्ठीनां चूर्ण श्वयथुनाशनम् । मूत्रं पिबेद्वा सलिलं तथैषाम् ॥५॥ आमाजीर्णप्रशमनं शुलन्नं बस्तिशोधनम् ॥ १२ ॥ कफे तु कृष्णासिकतापुराण पुरो मूत्रेण सेव्येत पिप्पली वा पयोऽन्विता। पिण्याकशिग्रुत्वगुमाप्रलेपः । गुडेन वाभया तुल्या विश्वं वा शोथरोगिणाम् ॥१२ कुलत्थशुण्ठीजलमूत्रसेक बकरीके दूधका सेवन करते हुए पुराना गुड़ मिलाश्वण्डागुरुभ्यामनुलेपनं च ॥ ६ ॥ कर अदरखका रस पीनेसे शीघ्र ही समस्त शोथ नष्ट कफजन्य शोथमें पुनर्नवा, सोंठ, निसोथ, गुर्च, अमलतासका हात है । इसा प्रकार पुननवा, दवदारु गूदा, हरे, तथा देवदारुका कल्क, गुग्गुलु व गोमूत्र मिलाकर क्वाथमें अथवा केवल गोमूत्रमें अथवा दशमूलके पीवे । अथवा इन्हींका क्वाथ बनाकर पीवे । तथा छोटी पीपल, क्वाथम गुग्गुल मिलाकर पानस वाल, पुराना पीनाक (तिलकी खली) सहिजनकी छाल और | बेलके पत्तोंका रस छानकर कालीमिर्च के चूर्णके साथ पीनेसे अलसीका लेप करना चाहिये । तथा कुलथी और सोंठका जल सन्निपातज शोथ, मलकी रुकावट, अर्श तथा कामलारोग नष्ट बना गोमत्र मिलाकर सेक करना चाहिये । तथा अजमोद होते हैं । इसी प्रकार गुड़, पिप्पली व साठका चूर्ण सजन, और अगरका लेप करना चाहिये ॥५॥६॥ आमाजीर्ण व शुलको नष्ट करता तथा बस्तिको शुद्ध करता है। | अथवा गोमूत्रके साथ गुग्गुलु अथवा छोटी पीपल दूधके साथ सन्निपातजशोथचिकित्सा। अथवा गुड़के साथ बड़ी हर्रका छिल्का अथवा सोंठका प्रयोग शोथवालोंको करना चाहिये ॥९-१३॥ अजाजिपाठापनपञ्चकोलव्याघ्रीरजन्यः सुखतोयपीताः । गुडयोगा। शोथं त्रिदोषं चिरजं प्रवृद्धं गुडाकं वा गुडनागरं वा निम्नन्ति भूनिम्बमहौषधे च ॥ ७॥ गुडाभयं वा गुडपिप्पली वा। जीरा, पाढ़, नागरमोथा, पञ्चकोल, छोटी कटेरी, तथा कर्षाभिवृद्धथा त्रिपलप्रमाणं हल्दी सब समान भाग ल चूर्णकर गरम गरम जलके साथ पीनेसे त्रिदोषज बढ़े पुराने शोथ नष्ट होते हैं। इसी प्रकार . खादेन्नरः पक्षमथापि मासम् ॥१४॥ चिरायता और सोंठके चूर्णको गरम गरम जलके साथ पीनेसे शोथप्रतिश्यायगलास्यरागान् पुराने शोथ नष्ट होते हैं ॥७॥ सश्वासकासारुचिपनिसांश्च ।
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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