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________________ चक्रदत्तः। [ ऊरुस्तम्मा wroorvser धन तथा। तं खादेदिष्टचेष्टान्नो यथावहिबलं नरः। | पर्णी, आंवला, तगर, नागकेशर, सुगन्धवाला, पद्माख, नीलोफर, वातरक्तं क्षयं कुष्ठं काय पित्तास्रसम्भवम् ॥६४॥ तथा चन्दन प्रत्येक एक तोलेका कल्क बना छोड़कर तैलपाक वातपित्तकफोत्थांश्च रोगानन्यांश्च तद्विधान् । | करना चाहिये । यह तैल पीने, मालिश तथा अनुवासन वस्तिहत्वा करोति पुरुषं वलीपलितवर्जितम् ॥६५॥ द्वारा प्रयोग करनेसे वातरक्तज तथा सन्निपातज अन्तरस्थ रोगोंको नष्ट करता है। यह सन्तान उत्पन्न करता, स्त्रियोंको गर्भधारण योगसारामृतो नाम लक्ष्मीकान्तिविवर्धनः। करता तथा वातपित्तज रोगोंको नष्ट करता, तथा स्वेद, खुजली, दिवास्वप्नाग्निसन्तापं व्यायाम मै पीड़ा, पामा, शिरःकम्प, अर्दित तथा वणदोषोंको नष्ट करता है, कटूष्णगुभिष्यन्दिलवणाम्लानि वर्जयेत् ॥६६॥ यह उत्तम “गुडूचीतैल" है ॥६७-७२॥ शतावरी, नागबला, विधारा, भुईआंवला पुनर्नवा, गुर्च, इति वातरक्ताधिकारः समाप्तः। छोटी पीपल, असगन्ध, गोखुरू, प्रत्येक ८ छ० कूट छानकर जितना चूर्ण तयार हो, उससे आधी शकर तथा शहद १॥ सेर ८ तोला, घी ६४ तो० और दालचीनी, तेजपात, इलायची अथोरुस्तम्भाधिकारः। प्रत्येकका चूर्ण ४ तोला मिलाकर रखना चाहिये । इसको अग्निबलादिके अनुसार सेवन करने तथा यथेष्ट आहार विहार करनेसे वातरक्त, क्षय, कुष्ठ, कार्य, पित्तरक्त वात-पित्त-कफजन्य सामान्यतश्चिकित्साविचारः। अन्य रोग नष्ट होते हैं और शरीर वलीपलिल रहित होता है ।। यह “ योगसारामृत " शोभा व कान्ति बढ़ानेवाला है । इस | श्लेष्मणः क्षपणं यत्स्यान्न च मारुतकोपनम् । औषधके सेवन कालमें दिनमें सोना, अग्नि तापना, व्यायाम, तत्सर्वं सर्वदा कार्यमूरुस्तम्भस्य भेषजम् ॥ १॥ मेथुन तथा कटु, उष्ण, गुरु, अभिष्यन्दि, नमकीन और खट्टे तस्य न स्नेहनं कार्य न बस्तिने च रेचनम् । पदार्थोंको त्यागना चाहिये ॥६१-६६ ॥ सर्वो रूक्षः क्रमः कार्यस्तत्रादौ कफनाशनः ॥२॥ बृहद् गुडूचीतैलम् । पश्चाद्वातविनाशाय कृत्स्नः कार्यः क्रियाक्रमः । तुला पचेजलद्रोणे गुडूच्याः पादशेषितम् । जो कफको शान्त करे और वायुको न बढ़ावे, ऐसी चिकित्सा क्षीरद्रोणं च ताभ्यां तु पचेत्तैलाढकं शनैः ॥ ६७॥ सदा ऊरुस्तम्भकी करनी चाहिये । इसमें स्नेहन, वस्ति और कल्कैर्मधुकमञ्जिष्ठाजीवनीयगणैस्तथा । विरेचन न करना चाहिये । प्रथम कफको शान्त करनेके लिये कुष्ठलागरुमृद्रीका मांसी व्याघ्रनखं नखी॥an | समस्त रूक्ष चिकित्सा करनी चाहिये । फिर वातनाशक चिकित्सा करनी चाहिये ॥१॥२॥हरेणु स्राविणी व्योषं शताहा भङ्गशारिवे। त्वपत्रे वचविक्रान्ता स्थिरा चामलकी तथा ॥६९/ केचन योगाः। नतं केशरहीबेरपनकोत्पलचन्दनः। सिद्धं कर्षसमै गैः पानाभ्यङ्गानुवासनः ॥७॥ शिलाजतुं गुग्गुलुं वा पिप्पलीमथ नागरम् ॥ ३ ॥ परं वातास्रजान्हन्ति सर्वजानन्तरास्थितान् । ऊरुस्तम्भे पिबेन्मूत्रैर्दशमूलीरसेन वा। । धन्यं पुंसवनं स्त्रीणां गर्भदं वातपित्तनुत् ॥ ७१ ॥ भल्लातकामृताशुण्ठीदारुपथ्यापुनर्नवाः ॥ ४॥ स्वेदकण्डूरुजापामाशिरःकम्पार्दितामयान् ।। पञ्जमूलीद्वयोन्मिश्रा ऊरुस्तम्भनिबर्हणाः। पिप्पलीपिप्पलीमूलभल्लातकाथ एव वा ॥५॥ हन्याद् व्रणकृतान्दोषान्गुडूचीतैलमुत्तमम् ॥७२॥ कल्को वा समधुर्देय ऊरुस्तम्भविनाशनः। गुर्च ५ सेर जल २५ से० ४८ तो मिलाकर पकाना त्रिफलाचव्यकटुकं ग्रन्थिकं मधुना लिहेत् ॥६॥ चाहिये, चतुर्थांश शेष रहनेपर उतारकर छान लेना चाहिये । ऊरुस्तम्भविनाशाय पुरं मूत्रेण वा पिबेत् । फिर उसी क्वाथमें दूध २५ सेर ४८ तो०, तिलतैल ६ सेर लिह्याद्वा त्रिफलाचूर्ण क्षौद्रेण कटुकायुतम् ॥७॥ ३२ तो० तथा मोरेठी, मजीठ, जीवनीयगण (जीवक, ऋषभक, काकोली, क्षीर काकोली, मेदा, महामेदा, मुद्गपर्णी, माषपर्णी, सुखाम्बुना पियेद्वापि चूर्ण षड्धरणं नरः। जीवंती, मौरेठी) कूठ, इलायची, अगर, मुनक्का, जटामांसी, पिप्पलीवर्धमानं वा माक्षिकेण गुडेन वा ॥ ८॥ व्याघ्रनख, नखी, सम्भालुके बीज, ऋद्धि, त्रिकटु, सौंफ, ऊरुस्तम्भे प्रशंसन्ति गण्डीरारिष्टमेव वा । भांगरा, सारिवा, दालचीनी, तेजपात, वच, वराहकान्ता, शाल-I चव्याभयाग्निदारूणां समधुः स्यादूरुग्रहे ॥९॥
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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