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________________ (८०) चक्रदत्तः। [राजयक्ष्मा - समाक्षिक कौडविक तत्सर्व खजमूछितम् । एषां पलोन्मितान्भागान् शतान्यामलकस्य च । स्त्यानं सर्पिर्गुडान्कृत्वा भूर्जपत्रेण वेष्टयेत् ॥ ४२॥ पञ्च दद्यात्तदैकध्यं जलद्रोणे विपाचयत् ॥ ४९ ॥ ताजग्ध्वा पलिकान्क्षीरे मद्यं चानुपिबेत्तथा। । ज्ञात्वा गतरसान्येतान्योषधान्यथ तं रसम् । शोषे कासे क्षतक्षीणे श्रमस्त्रीभारकर्षिते ॥ ४३ ॥ तच्चामलकमुद्धृत्य निष्कुलं तैलसर्पिषोः ॥५०॥ रक्तनिष्ठीवने तापे पीनसे चोरसि क्षते । पलद्वादशके भृष्ट्वा दत्त्वा चार्धतुलां भिषक् । शस्ताः पार्श्वशिरःशुले भेदे च स्वरवर्णयोः ॥४४॥ । मत्स्यण्डिकायाः पूताया लेहवत्साधु साधयेन्॥५१ काथ्ये त्रयोदशपले द्रव्याल्पत्वभयाजलम् । षट्पलं मधुनश्चात्र सिद्धशीते प्रदापयेत् । अष्टगुणं काथसमो विदार्याजरसौ पृथक् ॥४५॥ चतुष्पलं तुगाक्षीर्याः पिप्पल्या द्विपले तथा ॥५२॥ केचिद्यथोक्तक्काथ्ये तु काथं घृतसमं जगुः ।। पलमेकं निदध्याच त्वगेलापत्रकेशरात् । खरेटी, विदारीकन्द, लघुपञ्चमूल, पुनर्नवा, पांचों क्षीरिवृक्षों इत्ययं च्यवनप्राश: परमुक्तो रसायनः ।। ५३ ॥ (कपीतन, वट, गूलर, पीपल, प्लक्ष ) के कोमल पत्ते प्रत्येक ४| _बेलका गूदा, अरणी, सोनापाठा, खम्भार, पाढल, खरेटी, चार तोला उनका क्वाथ तथा घीसे द्विगुण दूध और विदारा-गवन. मघवन, छोटी पीपल, सरिवन, पिाठवन, गोखुरू, कन्दका रस तथा बकरेके मांसका रस घोके समान मिलाकर | छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, काकड़ाशिंगी, भू, आंवला, मुनक्का, तथा जीवनीयगणकी ओषधियांका कल्क प्रत्येकका १ तोला| | जीवन्ती, पोहकरमूल, अगर, बड़ी हर्रका छिल्का, गुर्च, ऋद्धि, मिलाकर एक आढ़क घृत पकाना चाहिये । घृत सिद्ध होती जीवक, ऋषभक, कपूरकचरी या. कपूर, नागरमोथा, पुनर्ववा, आनेपर उतार छानकर मिश्री ३२ पल तथा गेहूँका आटा, आटा, मेदा, छोटी इलायची, नीलोफर, लाल चन्दन, विदारीकन्द, छोटी पीपल, वंशलोचन, सिंघाड़ेका चूर्ण तथा शहद प्रत्येक अंडसकी छाल, काकोली, काकनासा प्रत्येक द्रव्य आठ आठ एक कुडव अर्थात् १६ तोला छोड़कर मिलाना चाहिये । लड्डू छ तो और ५०० ताजे पके हुए आंवलोंको छोड़कर एक द्रोण बनानके योग्य हो जानेपर एक एक पलके लड्डू बनाकर ऊपरसे जल अर्थात् (५१ सेर १६ तो० जल ) में पकाना चाहिये । भोजपत्र लपेट देना चाहिये । इनको खाकर दूध या मध पीना आमला पक जानेपर उतार ठपढाकर क्वाथ छानकर अलग रख चाहिये । यह राजयक्ष्मा, कास, क्षतक्षीण, थके तथा स्त्रीगमन लेना चाहिये । आंवले निकालकर उनकी गुठली निकाल कपव बोझा ढोनेसे कृश, खून थूकनेवालों तथा दाह व पीनससे इसे रगड़कर छना हुआ गूदा लेना चाहिये । और जो नसें पीड़ित व उरःक्षतसे युक्त पुरुषोंके लिये विशेष हितकर है । निकलती हैं, उन्हें अलग कर देना चाहिये । फिर इस गूदेको पसलियों तथा शिरका दर्द, स्वरभेद, वर्णविकृति भी इससे नष्ट काले तिलका तैल ४८ तोला और घी ४८ तोला छोड़कर होती है । क्वाथ्य द्रव्य घृतसे कम है, अतः अष्टगुण जल छोड़ना सेकना चाहिये। जब कुछ सुर्सी आ जावे और सुगन्ध उठने और चतुर्थांश शेष रखना तथा क्वाथके समान विदारीकन्दका | लगे तब, मिश्री ५ सेर और काढ़ा छोड़कर पकाना चाहिये । रस और बकरेके मांसका रस छोड़ना चाहिये । कुछका मत | अवलेह सिद्ध हो जानेपर उतार ठण्ढ़ा कर शहद ४८ तोला, है कि क्वाथ्य द्रव्य कम होनेपर भी क्वाथ घीके समान ही वंशलोचन ३२ तोला, छोटी पीपल १६ तोला, दालचीनी, बनाना चाहिये ॥ ३९-४५॥ | छोटी इलायची, तेजपात, नागकेशर प्रत्येक ८ तोला चूर्ण | किया हुआ मिलाना चाहिये । यह "च्यवनप्राश "तैयार हुआ। च्यवनप्राशः। यह परम रसायन है ॥४६-५३॥ बिल्वाग्निमन्थश्योनाककाश्मयः पाटली बला।। पर्ण्यश्चतस्रः पिप्पल्यः श्वदंष्ट्रा बृहतीद्वयम् ॥ ४६॥ च्यवनप्राशस्य गुणाः। शृङ्गीतामलकीद्राक्षाजीवन्तीपुष्करागुरु। कासश्वासहरश्चैष विशेषेणोपदिश्यते । अभया सामृता ऋद्धिर्जीवकर्षभको शठी ॥४७॥ क्षीणक्षतानां वृद्धानां बालानां चाङ्गवर्धनः ॥५४।। मुस्तं पुनर्नवा मेदा सूक्ष्मैलोत्पलचन्दने । स्वरक्षयमुरारोग हृद्रोगं वातशोणितम् । विदारी वृषमूलानि काकोली काकनासिका ॥४८॥ पिपासां मूत्रशुक्रस्थान्दोषांश्चैवापकर्षति ॥ ५५॥ अस्य मात्रां प्रयुजीत योपरुन्ध्यान्न भोजनम् । (१) ऋद्धि जीवक, ऋषभक, मेदा तथा काकोलीके | अस्य प्रयोगाच्च्यवनः सुवृद्धोऽभूत्पुनर्युवा ।।५६ ॥ अभावमें क्रमशः प्रतिनिधि द्रव्य ( बाराहीकन्द विदारी- मेधां स्मृति कान्तिमनामयत्वं कन्द, बिदारीकन्द, शतावर असगन्ध) छोड़ना चाहिये ।। वपुःप्रकर्ष बलमिन्द्रियाणाम् ।
SR No.032136
Book TitleChakradutt
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagannathsharma Bajpayee Pandit
PublisherLakshmi Vyenkateshwar Steam Press
Publication Year1863
Total Pages374
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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