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________________ ૨૬૧ पासेण पंजरेण य, बज्झति चउप्पया य पक्खीइ । इय जुवइपंजरेण य, बद्धा पुरिसा किलिस्संति ॥ ५२ ॥ अहो ! मोहो महामल्लो, जेण अम्हारिसा वि हु । जाणता वि अणिच्चत्तं, विरमंति न खणं पि हु ॥ ५३ ॥ जुवईहिं सह कुणतो, संसग्गिं कुणइ सयलदुक्खेहिं । नहि मुसगाणं संगो, होइ सुहो सह बिडालीहिं ॥ ५४ ॥ हरिहरचउराणणचंद-सूरखंदाइणोवि जे देवा । नारीण किंकरत्तं, कुणंति धिद्धी विसयतिण्हा ॥ ५५ ॥ सियं च उण्हं च सर्हति मूढा, इत्थीसु सत्ता अविवेअवंता । इलाइपुत्तु व्व चयंति जाई, जिअं च नासंति अ रावणुव्व ॥ ५६ ॥ वुत्तूण वि जीवाणं, सुदुक्करायंति पावचरियाई । भयवं जासा सासा, पच्चाएसो हु इणमो ते ॥ ५७ ॥ जललवतरलं जीअं, अथिरा लच्छी वि भंगुरो देहो । तुच्छा य कामभोगा, निबंधणं दुक्खलक्खाणं ॥ ५८ ॥ नागो जहा पंकजलावसन्नो, दठ्ठे थलं नाभिसमेइ तीरं । एवं जीआ कामगुणेसु गिद्धा, सुधम्ममग्गे न रया हवंति ॥ ५९ ॥ जह विट्ठपुंजखुत्तो, किमी सुहं मन्नए सयाकालं । तह विसयासुइरत्तो, जीवो वि मुणइ सुहं मूढो ॥ ६० ॥
SR No.032115
Book TitleAatmbodhak Granthtrai
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYogtilaksuri
PublisherSanyam Suvas
Publication Year2010
Total Pages292
LanguageGujarati, Sanskrit
ClassificationBook_Gujarati & Book_Devnagari
File Size11 MB
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