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________________ हूं। लेकिन मैं तुम्हें यह बात कह देता हूं इसे गांठ में बांध कर रख लो कि मैं कुछ भी नहीं जानता हूं। जानना जहां तक है, वहां तक तो जाना ही कहां! वहां तक तो उपद्रव जारी है। जहां जानने से छूटे, वहीं छूटे। वहीं मुक्ति है। वहीं परम ज्ञान है। जहां जानने से छूटे, वहां परम ज्ञान है। इसका अर्थ हुआ जहां ज्ञान से छूटे वहां परम ज्ञान है। तो परम ज्ञान शब्द ठीक नहीं है। ज्यादा अच्छा होगा, हम कहें-परम अज्ञान। तीसरा प्रश्न : कृपापूर्वक समझाएं कि बुद्धपुरुषों की पहचान क्या है? न समझा सकूँगा। इस संबंध में कृपा करने का भी कोई उपाय नहीं। यह बात कही ही नहीं जा सकती। बुद्धपुरुषों की कोई पहचान नहीं। और जितनी पहचानें तुम बना लोगे, उनसे भूल-चूक करोगे। क्योंकि जब भी बुद्धत्व प्रगट होता है, तब इतना अनूठा होता है, इतना अद्वितीय, इतना बेजोड़ कि वैसा पहले कभी हुआ ही नहीं था और वैसा पीछे फिर कभी नहीं होगा| पुनरुक्ति तो होती नहीं। तो तुम जो भी पहचान बना लोगे वह अड़चन हो जाएगी। अगर तुमने गौतम बुद्ध को देखकर पहचान बना ली, तो तुम महावीर को न पहचान पाओगे। अगर महावीर को देखकर पहचान बना ली तो तुम कृष्ण को न पहचान पाओगे। अगर कृष्ण को देखकर पहचान बना ली, तो तुम मुहम्मद को न पहचान पाओगे। तुमने जिसको देखकर पहचान बना ली, तुम उसी से बंध जाओगे और बाकी अनंत- अनंत बुद्ध तुम्हारी आंख से ओझल हो जाएंगे। तो पहचान से तुम चूकोगे, पहुंचोगे नहीं क्योंकि सब पहचान संकीर्ण होगी। पहचान का मतलब होगा-एक बुद्ध की होगी, बुद्धत्व की तो कोई पहचान नहीं होती। बुद्धत्व तो बड़ी विराट घटना है। जितने बुद्ध हुए हैं सब; जितने आज हैं, सब; और जितने भविष्य में होंगे, सब समस्त बुद्धों में कुछ है जो एक-सा है। और कुछ है, जो बिलकुल स्व-जैसा नहीं है। वह जो कुछ एक-सा है, वह आंतरिक है। वह दिखायी नहीं पड़ता, उसकी बाहर से पहचान नहीं हो सकती। और जो दिखायी पड़ता है, जो समझ में आता है, वह बिलकुल अलग- अलग है। महावीर नग्न खडे हैं, कृष्ण पीतांबर वस्त्रों में, सुंदर रेशमी वस्त्रों में। मोर-मुकुट बांधे हैं। बांसुरी लिए खड़े हैं। जीसस सूली पर लटके हैं। जीसस को तुम पाओगे यहूदियों के मंदिर में कोड़ा लिए, लोगों को खदेड़ते। बड़े सक्रिय हैं। इधर बुद्ध हैं, मूर्ति की भाति बोधिवृक्ष के नीचे बैठे हैं। जैसे कभी ये हिलेगे ही नहीं, डुलेगे ही नहीं। इधर लाओत्सु है, जो बिलकुल साधारण-से -साधारण मनुष्य की तरह जी रहा है। कि तुम्हें राह पर मिल जाएगा तो तुम पहचान न सकोगे भीड़ में सबसे साधारण वही है।
SR No.032114
Book TitleAshtavakra Mahagita Part 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherRebel Publishing House Puna
Publication Year
Total Pages444
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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