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________________ भ्रम विध्वंसनम् । तएवं सारयण दीव देवया खिस्संसा कलुणं जिण रविवयं कलु सेलग पिडाहि उवयंतं दासे, मउ सित्तिं जंपमाणी आणत सागर सलिलं गिरिहह वाहाहिं आरसंतं उड़द उव्हिहिति अंबर तले उवय माणं च मडलगेर पडिच्छित्ता निलुप्पल गवल सियागासेणं असिवरेशं खंडाखंडिं करेति २ त तत्थ विविलवमाणं तस्सय सरिसवहियस्स घेत्तणं अंगसमंगाति सरु राई उक्खित्तवलं चउद्दिसिं करेंति सा पंजली पट्टा ॥४२॥ १७४ ( ज्ञाता सूत्र अ० } तं० तिवारे. सार० र द्वीप नी देवी. केहनी है. नि० सूग रहित दया रहित परिणामे करी करुणा सहित जिन ऋषि प्रते. सपाप सहित देवी. से० सेलक यक्ष ना पूठ थकी. ॐ० ऊंचा थी देख्यो पड़ता ने दा० रे दास अरे गोला ! म० मूवो एहबो वचन बोलती थकी. अ० श्रर डाट ० समुद्र ना पाणी मांहे अण पहुंचता ने गि० ग्रही नें बा० बाहु सूं झाली ने. करतां ऊंचो उछाल्यो थः आकाश ने विषे. उ० पाछा आवता पड़ता ने त्रिशुल ने यग्रे करी. प०मेली ने. निः नोलो पलनी परे तीक्ष्ण. अ० खड्गे करी. खं० खंड २ करे करी नें ते० तेहना विलाप करता थाना सर अंगोपांग ग्रही नें वलि नी परे च्यारु दिशा ने विषे उछाले । अथ अठे को रयणा देवी, करुणा सहित जिन ऋषि ने दया रहित परिणामें करी हप्यो । ते दया रहित परिणामे करी जिन ऋषि ने हण्यो । अनें रयणा देवी रे साहमो जिन ऋषि जोयो ते सावदय करुणा छै । जिम करुणा सावय निरवद्य छै । तिम अनुकम्पा पिण सावदय निरवदद्य छै । केई पूछे अनु कम्पा दोय कहां कही छै । तेहनें पूछणो । करुणा सावदय निरवदय किहां कही छै । ए तो करुणा कहो भावे अनुकम्पा कहो । जे मोहना उदय थीं हियो कंपावे ते सावद अनुकम्पा । अनें मोह रहित निरवद्य कर्त्तव्य में हियो कंपावे ते निरवद्य अनुकम्पा । इतरो कह्यां समझ न पड़े तो आज्ञा विचार लेवी । डाहा हुवे तो विचारि जोइजो । इति ४० बोल सम्पूर्ण ।
SR No.032041
Book TitleBhram Vidhvansanam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayacharya
PublisherIsarchand Bikaner
Publication Year1924
Total Pages524
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size40 MB
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