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________________ xxi प्रबन्ध प्रकाशित होकर आज आप सभी महानुभवों के समक्ष आ रहा है। एतदर्थ में आप साध्वी-सन्त-रत्नद्वय का हृदय से अत्यन्त आभार अभिव्यक्त करता हूं तथा धन्यवाद भी करता हूं। संसार में आर्थिक सहयोग के बिना कोई भी कार्य सम्भव ही नहीं है। प्रस्तुत ग्रंथ प्रकाशन में उदारसहृदयी लाला हमीरचन्द्र जी का पूर्ण आर्थिक सहयोग प्राप्त हुआ है, इसके लिए मैं उनका तथा उनसे सम्बद्ध सभी परिजनों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रगट करता हूं तथा आप सभी सज्जनवृन्द के सुखी एवं समृद्ध तथा दीर्घजीवन की मंगकामना करता हूं। उदारचित्त गुरुजनों की अनुकम्पा से मैं इस दुर्गम कार्य को पूर्ण करने में समर्थ हो सका हूं / एतदर्थ, सर्वप्रथम में परमश्रद्धेय, संस्कृत विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ० मान सिंह का विशेष रूप से आभारी हूं, जिसके आर्शीवाद से मैं अपने शोध-प्रबन्ध को पूर्ण कर सका, अतः में उनका धन्यवादे करता हूं। __ शोध कार्य में रूची उत्पन्न करके प्रस्तुत विषय को सुझाने का श्रेय परमादरणीय डॉ. धर्मचन्द्र जैन को है जो इस शोध कार्य में मेरे निर्देशक भी हैं। जैनदर्शन के कुशल वेत्ता होने के कारण उनके निर्देशक में मुझे शोध कार्य में समुचित सुझाव एवं जानकारी प्राप्त होती रही और विषय आगे बढ़ता रहा और समृद्ध हो सका। उन्हीं के सतत प्रयास, अनुरागभाव एवं अमूल्य समय के योगदान से मैं इस कार्य को सम्पन्न एवं समय पर प्रस्तुत करने में सफल हो सका हूं / अत: मैं उनका हृदय से आभारी हूं और अत्यधिक धन्यवादी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के साथ-साथ दिल्ली विश्वविद्यालय, वीर सेवा मन्दिर दरियागंज, दिल्ली, जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा सिसाय (हिसार) एवं विशेष रूप से वर्द्धमान ग्रन्थागार, जैन विश्वभारती लाडनूं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए मुझे हार्दिक प्रसन्नता हो रही है जहां से शोधप्रबन्ध के लेखन में सभी प्रकार की सामग्री संचय करने में सहयोग मिला। इस अवसर पर मैं अपने पिता श्री हरि सिंह माता श्रीमती भगवानी देवी एवं भाई-बहिनों के प्रति भी आभार प्रगट करता हूं जिन्होंने मुझे इस योग्य बनाया। इस कार्य में यथोचित योगदान प्रदान करने वाली मेरी धर्म पत्नी श्रीमती विमला राणा एवं अन्य सहयोगी मित्रों का भी मैं सस्नेह धन्यवाद करता हूं / मैं जैन जगत् के समस्त साधु-साध्वियों एवं अन्य विद्वानों के प्रति श्रद्धापूर्ण आभार प्रगट करता हूं जिनसे मुझे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उनकी कृतियों से इस शोध कार्य को सम्पन्न करने में सहायता मिली हैं। श्री सुरेश चौधरी निर्मल पब्लिकेशनन्स् (दिल्ली) तथा उनके सभी साथियों का भी मैं
SR No.023543
Book TitleJain Darshan Me Panch Parmeshthi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJagmahendra Sinh Rana
PublisherNirmal Publications
Publication Year1995
Total Pages304
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size20 MB
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