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________________ (७३) प्रणुन्नवि तु मेहावी, किकम्मं पाइ ॥ १६ ॥ शब्दार्थः - शांत चित्तवाला, आसन नपर बेठेला, क्रोधादि दित ने बंदे इत्यादि कहेवा तैयार होय एवा गुरुने बुद्धिमान पुरुषो यज्ञा मागवा पूर्वक बंदला करवी ॥ १६ ॥ ८०० कारणे वांदणा देवानुं ए मुं द्वार कहे . • पक्किम्म सकाए, काउस्सग्गे वराद पाहुणए ॥ आलोयण संवरणे, उत्तमठे य वंदणयं ॥ १७ ॥ शब्दार्थः - प्रतिक्रमणमां, स्वाध्यायमां, कायोत्सर्गमां ने अपराध खमाववामां वांदणा देवा. वली नवा यावेला साधुने, आलोचनामां ने मासखमणादि तपरूप संवरमां तथा यंत संलेखना करतां एम आठ कारणे वांदणा देवा ॥ १७ ॥ वे पच्चीस आवश्यकनुं १० मुं द्वार कहे बे. दोवयं मदाजाय, यावत्ता बार चनसिर ति गुत्तं ॥ दुपवेसिग निकम, पणवीसावसय किइकम्मे ॥ १ ॥ शब्दार्थः-- वेपार व्यवनत, एकवार यथाजात, बारवार श्राव र्त्त, चारवार शिरनुं अवनत, त्रण गुप्ति, बेवार श्रवग्रदमा प्रवेश करवो ने एकवार निकलवु. ए पच्चीस श्रावश्यक वांदणामां होय . ॥ १८ ॥ द्वा. किइकम्मंपि कुतो न दोइ किइकम्मनिजरा नागी ॥ पणवी सामन्नयरं, साहुठाणं विरातो ॥ १९ ॥ शब्दार्थ:--ए पच्चीस आवश्यकमांना एकनी पण विराधना करतो एवो साधु, कृतिकर्म करतो बतो पण ते कृतिकर्मनी निर्झरानो जागी थतो नथी. ॥ १९ ॥ द्वा. १० ॥ हवे मुत्तिनी पच्चीस पबेिहानुं ११ मुं द्वार कहे बे. दिपि मिलेहण एगा, व उपप्फोम तिगतिगंत रिया ॥
SR No.023442
Book TitlePrakaranmala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHarishankar Kalidas Vadhvanwala
PublisherBhogilal Tarachand Shah
Publication Year1909
Total Pages242
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size23 MB
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